Thursday, September 28, 2023

इस तरह करें पितरों का तर्पण, उतरता है पूर्वजों का ऋण, सारे कष्ट हो जाएंगे दूर

पितरों का कर्ज चुकाना एक जीवन में तो संभव ही नहीं, उनके द्वारा संसार त्याग कर चले जाने के बाद भी श्राद्ध करते रहने से उनका ऋण चुकाने की परंपरा है। अगर पितर नाराज हो जाएं तो व्यक्ति का जीवन भी खुशहाल नहीं रहता और उसे कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है। यही नहीं घर में अशांति फैलती है और व्यापार व गृहस्थी में भी हानि झेलनी पड़ती है। ऐसे में पितरों को तृप्त करना और उनकी आत्मा की शांति के लिए पितृ पक्ष में श्राद्ध करना जरूरी माना जाता है।  भगवान भोलेनाथ के परम उपासक सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया कि श्राद्ध के जरिए पितरों की तृप्ति के लिए भोजन पहुंचाया जाता है और पिंड दान व तर्पण कर उनकी आत्मा की शांति की कामना की जाती है। श्राद्ध से जो भी कुछ देने का हम संकल्प लेते हैं, वह सब कुछ उन पूर्वजों को अवश्य प्राप्त होता है। जिस तिथि में जिस पूर्वज का स्वर्गवास हुआ हो उसी तिथि को उनका श्राद्ध किया जाता है जिनकी परलोक गमन की तिथि ज्ञान न हो, उन सबका श्राद्ध अमावस्या को किया जाता है। 

दिन का महत्व

जो पूर्णमासी के दिन श्राद्ध आदि करता है उसकी बुद्धि, पुष्टि, स्मरणशक्ति, धारणाशक्ति, पुत्र-पौत्रादि एवं ऐश्वर्य की वृद्धि होती। वह पर्व का पूर्ण फल भोगता है। प्रतिपदा धन-सम्पत्ति के लिए होती है एवं श्राद्ध करने वाले की प्राप्त वस्तु नष्ट नहीं होती। जो सप्तमी को श्राद्ध आदि करता है उसको महान यज्ञों के पुण्य फल प्राप्त होते हैं। अष्टमी को श्राद्ध करने वाला सम्पूर्ण समृद्धयिां प्राप्त करता है। नवमी को श्राद्ध करने से ऐश्वर्य एवं मन के अनुसार अनुकूल चलने वाली स्त्री को प्राप्त करता है। दशमी तिथि का श्रद्धा मनुष्य ब्रह्मत्व की लक्ष्मी प्राप्त कराता है।


श्राद्ध विधि

भविष्यवक्ता सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया कि पौराणिक ग्रंथों के अनुसार श्राद्ध करने की भी विधि होती है। यदि पूरे विधि विधान से श्राद्ध कर्म न किया जाए तो वह श्राद्ध कर्म निष्फल होता है और पूर्वजों की आत्मा अतृप्त ही रहती है। शास्त्रसम्मत मान्यता यही है कि किसी सुयोग्य विद्वान ब्राह्मण के जरिए ही श्राद्ध कर्म (पिंड दान, तर्पण) करवाना चाहिए। श्राद्ध कर्म में पूरी श्रद्धा से ब्राह्मणों को तो दान दिया ही जाता है साथ ही यदि किसी गरीब, जरूरतमंद की सहायता भी आप कर सकें तो बहुत पुण्य मिलता है। इसके साथ-साथ गाय, कुत्ते, कौवे आदि पशु-पक्षियों के लिए भी भोजन का एक अंश जरूर डालना चाहिए। श्राद्ध करने के लिए सबसे पहले जिसके लिए श्राद्ध करना है उसकी तिथि का ज्ञान होना जरूरी है। जिस तिथि को मृत्यु हुई हो उसी तिथि को श्राद्ध करना चाहिए। लेकिन कभी-कभी ऐसी स्थिति होती है कि हमें तिथि पता नहीं होती तो ऐसे में आश्विन अमावस्या का दिन श्राद्ध कर्म के लिए श्रेष्ठ होता है क्योंकि इस दिन सर्वपितृ श्राद्ध योग माना जाता है। दूसरी बात यह भी महत्वपूर्ण है कि श्राद्ध करवाया कहां पर जा रहा है। यदि संभव हो तो गंगा नदी के किनारे पर श्राद्ध कर्म करवाना चाहिए। यदि यह संभव न हो तो घर पर भी इसे किया जा सकता है। जिस दिन श्राद्ध हो उस दिन ब्राह्मणों को भोज करवाना चाहिए। भोजन के बाद दान दक्षिणा देकर भी उन्हें संतुष्ट करें।


इन पांच जीवों का ही चुनाव क्यों किया गया है

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया कि हमारे पितर धरती पर आकर हमें आशीर्वाद देते हैं।  पितृ पक्ष में पितरों का श्राद्ध करना बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है। हमारे पितृ पशु पक्षियों के माध्यम से हमारे निकट आते हैं और गाय, कुत्ता, कौवा और चींटी के माध्यम से पितृ आहार ग्रहण करते हैं।

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श्राद्ध के समय पितरों के लिए भी आहार का एक अंश निकाला जाता है, तभी श्राद्ध कर्म पूरा होता है। श्राद्ध करते समय पितरों को अर्पित करने वाले भोजन के पांच अंश निकाले जाते हैं गाय, कुत्ता, चींटी, कौवा और देवताओं के लिए। 

कुत्ता जल तत्त्व का प्रतीक है, चींटी अग्नि तत्व का, कौवा वायु तत्व का, गाय पृथ्वी तत्व का और देवता आकाश तत्व का प्रतीक हैं। इस प्रकार इन पांचों को आहार देकर हम पंच तत्वों के प्रति आभार व्यक्त करते हैं। केवल गाय में ही एक साथ पांच तत्व पाए जाते हैं। इसलिए पितृ पक्ष में गाय की सेवा विशेष फलदाई होती है।


कुछ बातों का ध्यान रखना भी जरूरी

1. श्राद्ध करने के लिए ब्रह्मवैवर्त पुराण जैसे शास्त्रों में बताया गया है कि दिवंगत पितरों के परिवार में या तो ज्येष्ठ पुत्र या कनिष्ठ पुत्र और अगर पुत्र न हो तो नाती, भतीजा, भांजा या शिष्य ही तिलांजलि और पिंडदान देने के पात्र होते हैं। 

2. पितरों के निमित्त सारी क्रियाएं गले में दाये कंधे मे जनेउ डाल कर और दक्षिण की ओर मुख करके की जाती है।

3. कई ऐसे पितर भी होते है जिनके पुत्र संतान नहीं होती है या फिर जो संतान हीन होते हैं। ऐसे पितरों के प्रति आदर पूर्वक अगर उनके भाई भतीजे, भांजे या अन्य चाचा ताउ के परिवार के पुरूष सदस्य पितृपक्ष में श्रद्धापूर्वक व्रत रखकर पिंडदान, अन्नदान और वस्त्रदान करके ब्राह्मणों से विधिपूर्वक श्राद्ध कराते है तो पितर की आत्मा को मोक्ष मिलता है। 


एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान

एकादशी का श्राद्ध सर्वश्रेष्ठ दान है। वह समस्त वेदों का ज्ञान प्राप्त कराता है। उसके सम्पूर्ण पापकर्मों का विनाश हो जाता है तथा उसे निरंतर ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। वहीं, द्वादशी तिथि के श्राद्ध से राष्ट्र का कल्याण तथा प्रचुर अन्न की प्राप्ति कही गई है। त्रयोदशी के श्राद्ध से संतति, बुद्धि, धारणाशक्ति, स्वतंत्रता, उत्तम पुष्टि, दीर्घायु तथा ऐश्वर्य की प्राप्ति होती है। 

ऐसे करें श्राद्ध

- श्राद्ध करने के लिए किसी ब्राह्मण को आमंत्रित करें, भोज कराएं और अपनी सामर्थ्य के अनुसार दक्षिणा भी दें।

- श्राद्ध के दिन अपनी सामर्थ्य या इच्छानुसार खाना बनाएं।

- आप जिस व्यक्ति का श्राद्ध कर रहे हैं उसकी पसंद के मुताबिक खाना बनाएं जो उचित रहेगा।

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Monday, September 25, 2023

जीवन में उन्नति के लिए क्यों जरूरी है पितृ तर्पण

कुछ ही दिनों में पितृ पक्ष आने वाला है जिसमें लोग अपने पितृ की पूजा-अर्चना करके उनको प्रसन्न करने का हर संभव प्रयास करते है सद्गुरूनाथ जी महाराज ने पितृपक्ष के पहले लोगों को पितृ पक्ष के बारे में विशेष जानकारी दी है जिससे कि लोग सही तरीके से पितृ पूजा का अर्थ समझ सकें और पितृपक्ष में सही विधि-विधान से पूजा कर अपने जीवन का कल्याण कर सकें।  एकैकस्य तिलैर्मिश्रांस्त्रींस्त्रीन् दद्याज्जलाज्जलीन। यावज्जीवकृतं पापं तत्क्षणादेव नश्यति। अर्थात जो अपने पितरों को तिलमिश्रित जल से तीन-तीन अंजलियां जल की प्रदान करता है, उसके जन्म से तर्पण के दिन तक के पापों का नाश हो जाता है।


माता-पिता की सेवा को सबसे बड़ी पूजा माना गया है। जो जीवन रहते उनकी सेवा नहीं कर पाते, उनके देहावसान के बाद बहुत पछताते हैं। इसीलिए हिंदू धर्म शास्त्रों में पितरों का उद्धार करने के लिए पुत्र की अनिवार्यता मानी गई है। राजा भागीरथ ने अपने पूर्वजों के उद्धार के लिए गंगा जी को स्वर्ग से धरती पर ला दिया। जन्मदाता माता-पिता को मृत्योपरांत लोग विस्मृत न कर दें इसलिए उनका श्राद्ध करने का विशेष विधान बताया गया है। 

हमारे हिंदू धर्म दर्शन के अनुसार जिस प्रकार जिसका जन्म हुआ है, उसकी मृत्यु भी निश्चित है उसी प्रकार जिसकी मृत्यु हुई है उसका जन्म भी निश्चित है। ऐसे कुछ विरले ही होते हैं जिन्हंे मोक्ष की प्राप्ति हो जाती है। पितृपक्ष में तीन पीढ़ियों तक के पिता पक्ष के तथा तीन पीढियों़ तक के माता पक्ष के पूर्वजों के लिए तर्पण किया जाता है। इन्हीं को पितर कहते हैं। दिव्य पितृ तर्पण, देव तर्पण, ऋषि तर्पण और दिव्य मनुष्य तर्पण के पश्चात ही स्व पितृ तर्पण किया जाता है। भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन कृष्णपक्ष अमावस्या तक के सोलह दिनों को पितृपक्ष कहते हैं। जिस तिथि को माता-पिता का देहांत होता है, उसी तिथि को पितृपक्ष में उनका श्राद्ध किया जाता है।

शास्त्रों के अनुसार पितृपक्ष में अपने पितरों के निमित्त जो अपनी शक्ति सामर्थ्य के अनुरूप शास्त्र विधि से श्रद्धापूर्वक श्राद्ध करता है, उसके सकल मनोरथ सिद्ध होते हैं और घर, परिवार, व्यवसाय तथा आजीविका में हमेशा उन्नति होती है। पितृ दोष के अनेक कारण होते हैं। परिवार में किसी की अकाल मृत्यु होने से, अपने माता-पिता आदि सम्माननीय जनों का अपमान करने से, मरने के बाद माता-पिता का उचित ढंग से क्रियाकर्म और श्राद्ध न करने से, उनके निमित्त वार्षिक श्राद्ध आदि न करने से पितरों का दोष लगता है। इसके फलस्वरूप परिवार में अशांति, वंश वृद्धि में रुकावट, आकस्मिक बीमारी, संकट, धन में बरकत न होना, सारी सुख सुविधाएं होते हुए भी मन असंतुष्ट रहना आदि पितृ दोष हो सकते हैं।

यदि परिवार के किसी सदस्य की अकाल मृत्यु हुई हो, तो पितृ दोष के निवारण के लिए शास्त्रीय विधि के अनुसार उसकी आत्म शांति के लिए किसी पवित्र तीर्थ स्थान पर श्राद्ध करवाएं। अपने माता-पिता तथा अन्य ज्येष्ठ जनों का अपमान न करें। प्रतिवर्ष पितृपक्ष में अपने पूर्वजों का श्राद्ध, तर्पण अवश्य करें। यदि इन सभी क्रियाओं को करने के पश्चात पितृ दोष से मुक्ति न होती हो तो ऐसी स्थिति में किसी सुयोग्य कर्मनिष्ठ विद्वान ब्राह्मण से श्रीमद् भागवत् पुराण की कथा करवाएं। वैसे श्रीमद भागवत पुराण की कथा कोई भी श्रद्धालु पुरुष अपने पितरों की आत्म शांति के लिए करवा सकता है। इससे विशेष पुण्य फल की प्राप्ति होती है।

Thursday, September 21, 2023

सद्गुरूनाथ जी महाराज की कृपा से मुसीबत से मिला छुटकारा

 


क्या आपके साथ कभी कोई ऐसा वाकया हुआ है, जब आपको लगा हो स्वयं सद्गुरूनाथ जी महाराज ने आपकी सहायता की?  

संध्या पटना से सद्गुरूनाथ जी महाराज की शिष्या ने सद्गुरूनाथ जी महाराज से दीक्षा ली थी। कुछ दिन पहले उन्होंने ईमेल द्वारा अपनी अनुभूति बताई है। जो इस प्रकार है।  

मेरे साथ एक बार नहीं, कई बार ऐसा हुआ है ज़ब जीवन में लगा कि सद्गुरूनाथ जी महाराज ने मेरी किसी ना किसी रूप में मदद की हो..... !

ये उस समय की घटना ज़ब मेरी शादी को केवल 15 दिन ही हुए थेै  मेरे भाई बहन सब मुझसे छोटे हैं, मैं घर में सबसे बड़ी हूँ इसलिए मुझमें समझदारी भी काफ़ी है।मेरी शादी के बाद मेरे मायके से मेरे छोटे भाई बहन मुझे लेने आये थे। चूँकि भाई मुझसे 8 साल छोटा है, वो 9 में पढ़ता है। जिस दिन मेरा भाई मेरे चचेरे भाई बहनों के साथ आया था उस दिन नवरात्रि चल रही थी।  उस दिन आने जाने में काफ़ी भीड़ रहती थी। 

ये लोग शाम को 5 बजे तक आ पाए थे, उसके बाद हम लोग घर के लिये निकले मेरा मायका मेरे ससुराल से 40 कि. मी. है तो किसी बड़े ने साथ में आने की बात भी नहीं सोची। 

जैसे तैसे 8 बजे रात के निकलना हुआ, मैं क्यूँकि पहली बार ससुराल से मायके जा रही थी तो पूरे ज़ेवर भी पहने थी। हम लोग खूब खुश होकर जा रहे थे तभी रास्ते में करीब 25 कि. मी. आगे आकर गाडी खराब हो गई, ड्राइवर किराये का था, उसने जंगल में गाडी रोक दी। अब सब बच्चे परेशान होने लगे। केवल लड़कियाँ और छोटे लड़के, मेरी छोटी बहिन जो मुझसे केवल 2 साल छोटी है उसने घर पर फ़ोन किया।

घर वाले सब परेशान हो गए क्यूँकि रात ज्यादा होती जा रही थी और किसी के पास घर पर बाइक के अलावा कोई गाडी भी नहीं थी। जो ड्राइवर था वो भी इधर उधर फोन करने लगा। मैं उसके इरादे समझ गई थी, लेकिन मैंने अपने भाई बहनों को कुछ भी परेशानी जाहिर नहीं की।

बल्कि मैं यही कहती रही कुछ नहीं होगा अभी कोई ना कोई मदद आ जाएगी, लेकिन मन ही मन बहुत ज्यादा डर लग रहा था मेरे घरवालों ने ससुराल वालों को फ़ोन किया उन्होंने उल्टा मेरे पापा को खरी खोटी सुना दी। 

मैंने फिर अपने गुरूवर सद्गुरूनाथ जी महाराज को याद किया, क्यूँकि कभी भी कोई परेशानी होती है, मेरे गुरूवर मदद जरूर करते हैं। मेरे मायके में गुरूजी जी को बहुत माना जाता है, तो मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने गुरूजी का जी का भजन मोबाइल में हल्की आवाज़ में चला लिया, मैं गाडी के अंदर बैठी थी और जेवर उतार कर बैग में रख लिये केवल नथ मुझसे नहीं उतर पा रही थी तो मैंने शाल से मुँह ढक लिया। 


अब मुझे रोना आ रहा था लेकिन रो भी नहीं पा रही थी केवल मन ही मन बोल रही थी गुरूजी जी मदद, गुरूजी जी मदद........ !!

उधर मेरे घर वाले गाड़ी का बंदोबस्त करने में लगे थे लेकिन कोई भी आने को तैयार नहीं था।

इधर मैं गुरू जी को याद कर रही थी (यहाँ तक कि अभी मैं जब ये घटना लिख रही हूँ तो आँखों में आँसू आ रहे हैं) उधर बिहारी जी ने मदद भेज दी लगभग 15 मिनट मैंने बिहारी जी को याद किया तभी हमारे खानदान के एक परिचित अपनी इंनोवा गाड़ी लेकर आये और जहाँ हमारी गाड़ी ख़डी थी वहीं उन्होंने गाड़ी रोक दी। हालांकि उन्हें हमारे बारे में वहाँ होने की कोई जानकारी नहीं थी, उन्होंने पूछा तुम लोग यहाँ कैसे फिर मेरी बहिन ने सब बताया, उन अंकल ने पापा को फोन किया और कहा आप परेशान मत होना मैं बच्चों को ला रहा हूँ।

इसे कहते हैं गुरू कृपा... !

अब जो ड्राइवर था उसका मुँह देखने लायक था, अंकल ने सबको गाडी में बिठाया और केवल आधे घंटे में घर पहुंचा दिया। मैं रास्ते भर आँसू रोकने की कोशिश करती रही लेकिन आंसू रुक नहीं पा रहे थे। गुरूजी को याद किया और उन्होंने मदद के लिये किसी को भेज दिया।

अब सोचती हूँ अपने तर्क भी लगाती हूँ कि ये एक इक्तेफाक भी हो सकता है, लेकिन इक्तेफाक इतना नहीं हो सकता कि उसी समय किसी का इंनोवा लेकर आना।


क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपको लगाहो कि स्वयं सद्गुरूनाथ जी ने आपकी मदद की है

Tuesday, September 19, 2023

गुरु दीक्षा लेने के बाद जीवन में किस तरह के बदलाव आते हैं?

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने गुरू दीक्षा मानव जीवन के लिए क्यों इतना जरूरी है इस विषय पर प्रकाश डाला और कहा कि आध्यात्मिक गुरु के मार्गदर्शन के बिना आत्मा को जानना या मुक्ति को पाना कदापि संभव नहीं है। इसलिए संतवाणियों और धर्मशास्त्रों में सच्चे गुरु की खोज करने के लिए प्रेरित किया गया है।

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने लोगों को समझाया कि मोक्ष या मुक्ति की प्राप्ति कैसे हो? इसके लिए एक ही आधार है आत्मज्ञान यानि अपनी आत्मा के स्वरूप को अनुभव से जान लेना। आत्मा, परमात्मा और मोक्ष संबंधी जो विद्या है उसे आध्यात्मिक विद्या कहते हैं। अध्यात्म =अधि $ आत्मा अर्थात आत्मा संबंधी। सांसारिक विद्याओं को सीखने के लिए हमें सांसारिक गुरु की आवश्यकता पड़ती है। ठीक उसी तरह यदि हम अपने अंदर के आध्यात्मिक पथ के बारे में जानना चाहें, आध्यात्मिक विद्या को जानना चाहे तो उसे जिस व्यक्ति से जानेंगे वे ही हमारे आध्यात्मिक गुरु होंगे।

1. प्रश्न गुरु दीक्षा क्या है?

सद्गुरूनाथ जी महाराज -गुरु दीक्षा में गुरु अपने शिष्य के अंदर बीज रूपी मंत्र को स्थापित करते हैं, जब शिष्य इस बीज मंत्र का जप करता है तो वह इस बीज को पुष्ट करता है। यह प्रक्रिया वैसे ही है जैसे हम बीज लाकर उसे धरती में बोते हैं फिर उसका खाद, पानी, धूप, हवा आदि के द्वारा सिंचन करते हैं फिर धीरे धीरे बीज अंकुरित होता है और समय के साथ वृक्ष बनता है। जब हम गुरु मंत्र का निरंतर गुरु मार्गदर्शन में जप करते हैं तो एक समय बाद वह मंत्र सिद्ध होता है तथा हमें सिद्धि रूपी फल प्राप्त होता है। गुरु मंत्र ईश्वर प्राप्ति का सबसे सरल तथा सुगम माध्यम है।


2. प्रश्न: मंत्र गुरु से ही क्यों लें, स्वयं ले कर उसका जप क्यों न करें?

सद्गुरूनाथ जी महाराज: जिस प्रकार बाज़ार में माता-पिता अपने बालक के लिये श्रेष्ठ वस्तु का चयन करते हैं उसी प्रकार गुरु भी अपने शिष्य के लिये उपयुक्त मंत्र का चयन कर प्रदान करते हैं। बहुत से ऐसे मंत्र हैं जो कीलित हैं, गुरु जब मंत्र प्रदान करते हैं तो वह उत्कीलन करके ही प्रदान करते हैं जिससे शिष्य पूर्ण लाभ प्राप्त कर सकता है।

स्वयं मंत्र का चयन करने के बहुत हानि हैं जैसे अवांछित शक्तियों का जाग्रत हो जाती हैं, कीलित मंत्र का जप व्यर्थ है, जब कर्म कटने प्रारम्भ होंगे तो जो कष्ट आयेंगे उनसे रक्षा करने वाला कोई न होगा, सभी मन्त्रों का 1 निश्चित क्रम होता है उसे न जानने पर वह मंत्र हानि भी पहुंचा सकता है।

प्रश्न 3. गुरु दीक्षा लेने के बाद जीवन में किस तरह के बदलाव आते हैं?

सद्गुरूनाथ जी महाराज: आपका मनुष्य जीवन बिना गुरू के परिपूर्ण ही नहीं हो सकता, गुरू-दीक्षा लेने के बाद आपके अंदर की शक्तियां और कुंडली जागृत हो जाता है जिससे आपके सारे काम स्वतः ही बनने लगते है। बस जरूरत है आपको गुरू के प्रति पूर्ण श्रद्धा और समर्पण रखने की। भगवान के बाद गुरू ही आपके सच्चे हितैषी इस दुनिया में है।


अगर आप गुरु के बताये मार्ग का अनुसरण करते हैं तो विश्वास मानिये आपके जीवन मे बहुत से सुखद बदलाव आपको देखने को मिल सकते हैं जैसे मानसिक शांति, अपार धन संपदा (अगर आप चाहते हैं), मान सम्मान, यश, वैभव तथा जीवन ऐसा हो जायेगा जैसे आपने अपनी जीवन नैया गुरुदेव के हाथ सौंप दी है और गुरु भगवान उस नौका को स्वयं भवसागर से पार लगा रहे हैं परंतु ऐसा तब होगा जब आपको साधना करते हुए कम से कम 2दृ3 वर्ष बीत जाएंगे तथा आप अपने गुरुमंत्र को जाग्रत कर लेंगे। गुरु सिर्फ हमको मार्ग दिखा सकते हैं उस मार्ग पर चलना हमारा ही काम है, यह मार्ग बहुत कठिन है जिसपर हमें चलना है, गुरु सिर्फ हमें कठनाई को पार करने का तरीका बतायेंगे, कठिनाई हमें स्वयं पर करनी है।

सनातन वैदिक धर्म में दृढ़ मान्यता है कि आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है। जब एक शरीर का अंत होता है तो आत्मा किसी दूसरे शरीर में प्रवेशकर नया जन्म धारण करती है। यह पुनर्जन्म का चक्र या आवागमन का चक्र तब तक चलता रहता है जब तक मानव साधना द्वारा अपने को मोक्ष या मुक्ति की स्थिति में नहीं पहुंचा लेता।




Monday, September 18, 2023

वैदिक धर्म के आधार पर ये है भाग्य का सही अर्थ

गत दिनों अपने प्रवचन के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराज ने लोगों की जिज्ञासा को शांत करते हुए भाग्य और कर्म का इतना सटीक अर्थ बताया कि लोग के मन में आ रहे सारे प्रश्न का जवाब एक साथ मिल गया। सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि संसार में बहुत से लोग कहते देखे जाते हैं कि इसके भाग्य में तो यही लिखा हुआ था या यह तो होना ही था परन्तु ऐसा कहना सही नहीं है।  पूर्वकृत कर्मों का फल भाग्य अवश्य है परन्तु सब कुछ जो कुछ भी संसार में घटित होता है वह सब पूर्वकृत् कर्मों का फल नहीं होता जैसे किसी की अल्पायु में सडक दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है तो वह किसी अन्य की गलती या स्वयं उसकी गलती या अकस्मात् हुए संयोग का परिणाम होता है। यह अलग बात है कि यहां गलती करने वाले का नया कर्म बनता है जो कालान्तर में परिणाम देता है। इसी प्रकार की स्थिति अन्य उदाहरणों में भी समझनी चाहिए।


फिर मन में एक प्रश्न यह उठता है कि यह कैसे पता चले कि कहां पूर्वजन्मकृत कर्मों का फल मिल रहा है कहां इसी जन्म में किए अपने या किसी अन्य के द्वारा की गई सुकृत् या दुष्कृत् का फल या परिणाम मिल रहा है  तो इसका सीधा सा उत्तर यही है कि शास्त्रों के अनुसार पूर्वजन्म कृत कर्मों का फल जीव को जाति अर्थात् मनुष्य जाति, पशु जाति,प क्षी जाति आदि के रुप में, आयु अर्थात् प्राप्त योनि के अनुसार आयु व भोग आदि के रुप में मिलता है।  दूसरे इसे पहचानने का एक सरल उपाय यह है कि जिस फल की प्राप्ति के लिए हमने इस जन्म में कोई परिश्रम नहीं किया फिर भी वह फल हमें इस जन्म में प्राप्त हो रहा है तो समझना चाहिए कि वह पिछले जन्म के कर्म का फल है क्योंकि कर्म के बिना फल प्राप्ति असम्भव है।  यही पूर्वकृत कर्मों के फल अर्थात् भाग्य के विषय में समझना चाहिए।


पुरुषार्थ का नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों को भी अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती, कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा सकता। कभी- कभी स्त्रियों के पेट से मनुष्याकृति से भिन्न आकृति के बच्चे जन्म लेते देखे गए हैं। कभी- कभी कोई पेड़ असमय में ही फल-फूल देने लगता है, कभी-कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्व निश्चित भाग्य-विधान के अनुसार होती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। जिसके भाग्य में जैसा होता है, वैसा यदि अमिट ही है, तो फिर पुरुषार्थ करने से भी अधिक क्या मिलता और पुरुषार्थ न करने पर भी भाग्य में लिखी सफलता अनायास ही क्यों न मिल जाती?


भाग्य क्या है? यह अपने आप में ही एक बड़ा प्रश्न है। सबके लिए भाग्य की परिभाषा अलग अलग हो सकती है। जैसे कुछ लोगों के लिए भाग्य के अंतर्गत धन-संपत्ति आ सकती है, कुछ सुख शांति होने पर खुद को भाग्यशाली मानते हैं, तो कुछ कर्म के आधार भाग्य की उत्पत्ति मानते हैं। यानि जो लोग कहते हैं की कर्म करते हैं पर भाग्य साथ न देता तो वो पूरी तरह कर्मठ नहीं है। एक कहावत है कि समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी किसी को कुछ नहीं मिलता। लेकिन ज़रा सोचिये 84 लाख योनियों में मनुष्य योनी में जन्म भाग्य की ओर इशारा नहीं करता, संसार में कई ऐसे विरले पड़े हैं जिनको पारिवारिक प्रेम नहीं मिला लेकिन समाज में उन्हें पूर्ण सम्मान प्राप्त है, यह भी भाग्य का ही एक रूप माना जा सकता है.


वास्तव में भाग्य-यश, प्रेम, धन, स्वास्थ्य; इन सभी रूपों में या किसी एक रूप में आपके पास हो सकता है. ईश्वर सभी को योग्यता व कर्मानुसार भाग्य प्रदान करता ही है। अतः जरूरत है कि हम हमारे हिस्से में आए आशीर्वाद को सस्नेह ग्रहण करें और ईश्वर से संतोषरूपी धन की याचना करें, क्योंकि ‘हर स्थिति में संतुष्ट रहने से ही सुख प्राप्त होता है.’


Saturday, September 16, 2023

108 बार जाप करने के पीछे क्या है आध्यात्मिक कारण जानिए

ऊं का जप करते समय 108 प्रकार की विशेष भेदक ध्वनी तरंगे उत्पन्न होती है जो किसी भी प्रकार के शारीरिक व मानसिक घातक रोगों के कारण का समूल विनाश व शारीरिक व मानसिक विकास का मूल कारण है। बौद्धिक विकास व स्मरण शक्ति के विकास में अत्यन्त प्रबल कारण है...108 यह अद्भुत व चमत्कारी अंक बहुत समय काल से हमारे ऋषि - मुनियों के नाम के साथ प्रयोग होता रहा है।  


संख्या 108 का रहस्य - 

अ→1 ... आ→2 ... इ→3 ... ई→4 ... उ→5 ... ऊ→6. ... ए→7 ... ऐ→8 ओ→9 ... औ→10 ... ऋ→11 ... लृ→12 अं→13 ... अ:→14.. ऋॄ →15... लॄ →16 क→1 ... ख→2 ... ग→3 ... घ→4 ...ङ→5 ... च→6 ... छ→7 ... ज→8 ...

झ→9 ... ञ→10 ... ट→11 ... ठ→12 ... ड→13 ... ढ→14 ... ण→15... त→16...थ→17 ... द→18 ... ध→19 ... न→20 ...प→21 ... फ→22 ... ब→23 ... भ→24 ... म→25 ... य→26 ... र→27 ... ल→28 ... व→29 ... श→30 ... ष→31 ... स→32 ...ह→33 ... क्ष→34 ... त्र→35 ...ज्ञ→36 ... ड़ ... ढ़ ... ओ अहं = ब्रह्म ब्रह्म = ब+र+ह+म =23+27+33+25=108

1. यह मात्रिकाएँ (18 स्वर +36 व्यंजन=54) नाभि से आरम्भ होकर ओष्टों तक आती है, इनका एक बार चढ़ाव, दूसरी बार उतार होता है, दोनों बार में वे 108 की संख्या बन जाती हैं। इस प्रकार 108 मंत्र जप से नाभि चक्र से लेकर जिव्हाग्र तक की 108 सूक्ष्म तन्मात्राओं का प्रस्फुरण हो जाता है। अधिक जितना हो सके उतना उत्तम है पर नित्य कम से कम 108 मंत्रों का जप तो करना ही चाहिए ।


2. मनुष्य शरीर की ऊँचाई

= यज्ञोपवीत(जनेउ) की परिधि 

= (4 अँगुलियों) का 27 गुणा होती है। 

= 4 × 27 = 108

3. नक्षत्रों की कुल संख्या = 27

प्रत्येक नक्षत्र के चरण = 4

जप की विशिष्ट संख्या = 108

अर्थात ॐ मंत्र जप कम से कम 108 बार करना चाहिये ।



4.  एक अद्भुत अनुपातिक रहस्य

पृथ्वी से सूर्य की दूरी/ सूर्य का व्यास= 108

पृथ्वी से चन्द्र की दूरी/ चन्द्र का व्यास= 108

अर्थात मन्त्र जप 108 से कम नहीं करना चाहिये।


5. हिंसात्मक पापों की संख्या 36 मानी गई है जो मन, वचन व कर्म ३ प्रकार से होते है। अर्थात 36×3=108 अत: पाप कर्म संस्कार निवृत्ति हेतु किये गये मंत्र जप को कम से कम 108 अवश्य ही करना चाहिये।



6.  सामान्यत: 24 घंटे में एक व्यक्ति 21600 बार सांस लेता है। दिन-रात के 24 घंटों में से 12 घंटे सोने व गृहस्थ कर्त्तव्य में व्यतीत हो जाते हैं और शेष 12 घंटों में व्यक्ति जो सांस लेता है वह है 10800 बार। इस समय में ईश्वर का ध्यान करना चाहिए । शास्त्रों के अनुसार व्यक्ति को हर सांस पर ईश्वर का ध्यान करना चाहिये । इसीलिए 10800 की इसी संख्या के आधार पर जप के लिये 108 की संख्या निर्धारित करते हैं।

7.  एक वर्ष में सूर्य 21600 कलाएं बदलता है। सूर्य वर्ष में दो बार अपनी स्थिति भी बदलता है। छःमाह उत्तरायण में रहता है और छः माह दक्षिणायन में। अत: सूर्य छः माह की एक स्थिति

में 108000 बार कलाएं बदलता है।

8.  ब्रह्मांड को 12 भागों में विभाजित किया गया है। इन 12 भागों के नाम - मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुंभ और मीन हैं। इन 12 राशियों में नौ ग्रह सूर्य, चंद्र, मंगल, बुध, गुरु, शुक्र, शनि, राहु और केतु विचरण करते हैं। अत: ग्रहों की संख्या 9 में राशियों की संख्या 12 से गुणा करें तो संख्या 108 प्राप्त हो जाती है।

9.  108 में तीन अंक हैं, 1+0+8. इनमें एक “1" ईश्वर का प्रतीक है। ईश्वर का एक सत्ता है अर्थात ईश्वर 1 है और मन भी एक है, शून्य “0" प्रकृति को दर्शाता है। आठ “8" जीवात्मा को दर्शाता है क्योकि योग के अष्टांग नियमों से ही जीव प्रभु से मिल सकता है । जो व्यक्ति अष्टांग योग द्वारा प्रकृति के आठो मूल से  विरक्त हो कर ईश्वर का साक्षात्कार कर लेता है उसे सिद्ध पुरुष कहते हैं। जीव “8" को परमपिता परमात्मा से मिलने के लिए प्रकृति “0" का सहारा लेना पड़ता है। ईश्वर और जीव के बीच में प्रकृति है। आत्मा जब प्रकृति को शून्य समझता है तभी ईश्वर “1" का साक्षात्कार कर सकता है। प्रकृति “0" में क्षणिक सुख है और परमात्मा में अनंत और असीम। जब तक जीव प्रकृति “0" को जो कि जड़ है उसका त्याग नहीं करेगा , अर्थात शून्य नही करेगा, मोह माया को नहीं त्यागेगा तब तक जीव “8" ईश्वर “1" से नहीं मिल पायेगा पूर्णता (1+8=9) को नहीं प्राप्त कर पायेगा । 9 पूर्णता का सूचक है।

1- ईश्वर और मन

2- द्वैत, दुनिया, संसार

3- गुण प्रकृति (माया)

4- अवस्था भेद (वर्ण)

5- इन्द्रियाँ

6- विकार

7- सप्तऋषि, सप्तसोपान

8- आष्टांग योग

9- नवधा भक्ति (पूर्णता)

11.  वैदिक विचार धारा में मनुस्मृति के अनुसार 

अहंकार के गुण = 2

बुद्धि के गुण = 3

मन के गुण = 4

आकाश के गुण = 5

Thursday, September 14, 2023

ईश्वर को पाने के लिए प्रेम मार्ग से गुजरना होगा: सद्गुरूनाथ जी महाराज

जब व्यक्ति का प्रेम कामना रहित होता है तो यह शक्ति होती है और जब प्रेम में किसी चीज को पाने का लोभ रहता है तो यह आसक्ति बन जाती है। सच्चा प्रेम वह होता है जो प्रेम में किसी प्रकार का लोभ और किसी चीज को पाने की कामना नहीं रखता है। ऐसा व्यक्ति प्रेम में ऐसा कमाल कर जाता है कि, बड़े से बड़े बलवान और धनवान उसके आगे घुटने टेक देते हैं।

मीराबाई को दिया गया जहर असरहीन होना। धु्रव को पहाड़ की चोटी से गिराने पर भी बच जाना, प्रह्लाह का आग के शोलों में भी मुस्कुराते हुए रहना और तुलसीदास का उफनती नदी को पार कर जाना यह प्रेम की शक्ति का उदाहरण है। सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि जिसके हृदय में सच्चा प्रेम होता है वही व्यक्ति ईश्वर का भक्त हो सकता है। जरूरत है बस प्रेम की चाहे वह पैसे से हो, किसी स्त्री से, बच्चे से या अन्य सांसारिक वस्तुओं से।

अगर हृदय में प्रेम होगा ही नहीं तो ईश्वर क्या संसार में किसी चीज से लगाव हो ही नहीं सकता। भगवान से प्रेम करना वास्तव में उसी प्रकार है जैसा एक दिशाहीन गाड़ी को सही दिशा देना। गुरूदेव ने कहा है कि जिसके हृदय में प्रेम का अंकुर होता है उस व्यक्ति को भक्ति की ओर प्रेरित किया जा सकता है, क्योंकि प्रेम का वृक्ष तभी उग सकता है जब प्रेम का बीज, प्रेम का अंकुर हृदय में मौजूद हो। बिना बीज के खेती भला कैसे हो सकती है।

आज के समय में ईश्वर प्रेमियों की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इतने संसारी संसाधनों और आकर्षणों के बीच, असत्य भरे माहौल में रहकर भक्ति कैसे की जाए? यह कला अगर सीखनी है तो शबरी से बेहतर उदाहरण और कौन होगा, जिसने तामसिक और असत्य से भरे मायावी वातावरण के बीच रहते हुए भी भक्ति की शीतल अग्नि का चुनाव किया, श्रीराम का चुनाव किया।

इंसान के कर्म उसके विचारों से उत्पन्न होते हैं। शुभ विचारों में बहुत शक्ति होती है। ये शब्द बहुत ही उपयुक्त हैं। आज कई समस्याएँ सिर्फ इसलिए मौजूद हैं क्योंकि हमने आंतरिक शांति की उपेक्षा कर दी है। इसलिए पहले हैपी थॉट्स द्वारा आंतरिक शांति उत्पन्न करें।’ मन का बुद्ध बनना अर्थात मन को ऐसा प्रशिक्षण देना, जिससे मन हर ऽ परिस्थिति में शांत अथवा आनंदित रह पाए। समस्याएँ, बीमारियाँ या कोई भी घटना होने के बावजूद जब मन अकंप, आनंदित और सकारात्मक रह पाता है तब होती है मन के बुद्ध बनने की यात्रा। यह यात्रा किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है, 

 जब लहर स्वअनुभव से अपने मूल स्वरूप को जानकर, विशाल समुंदर के साथ एक हो जाएगी तो उसके सभी तनाव, दुःख, समस्याएँ सब एक साथ विलीन हो जाएँगे।

Wednesday, September 13, 2023

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया मूलाधार चक्र की विशेषताएं

 एक नया दिन आता है तो साथ में नया उल्लास और नईं आश लेकर भी आता है ताकि हम अपने जीवन को नयें विचारों से सुवासित एवं उल्लासित कर सकें। मानव मन को भी प्रतिदिन सद्विचार और सत्संग रूपी साबुन से स्वच्छ करने की जरूरत होती है ताकि विचारों की कलुषिता का मार्जन हो सके।

सद्गुरूनाथ जी महाराज अक्सर सत्संग के दौरान कहते हैं कि यदि बुद्धि को परिमार्जित करते हुए उसमें प्रतिदिन साफ करके कुछ श्रेष्ठ विचार, कुछ सद्विचार न भरे जाएं तो हमारे वही कलुषित विचार जीवन के लिए जहर बनकर उसकी आत्मिक उन्नति में बाधक बन जाते हैं। सदा सत्संग के आश्रय में रहो ताकि हृदय की निर्मलता और विचारों की पवित्रता बनी रहे।

आज सद्गुरूनाथ जी महाराज मूलाधार चक्र के बारे में बता रहे है जिसको सक्रिय करने के बाद आप जीवन में श्रेष्ठ मुकाम हासिल कर सकते हैं। दुःख आपको छू भी नहीं पाएगी।

मूलाधार का मतलब है मूल आधार यानी यह हमारे भौतिक ढांचे का आधार है। अगर यह आधार स्थिर नहीं हुआ तो इंसान न तो अपना स्वास्थ्य ठीक रख पाएगा, न ही अपनी कुशलता और संतुलन ठीक रख पाएगा। इंसान के विकास के लिए ये खूबियां बेहद ही आवश्यक हैं। ऐसा माना जाता है कि पिछले जीवन की यादें तथा कार्यों को इस क्षेत्र में संग्रहित किया जाता है। इस चक्र की वजह से मनुष्य को चेतना, जीवन शक्ति और संवृध्दि जैसी विशेषताएं प्राप्त होती हैं। हालांकि, इसके अनुचित कार्य की वजह से परिणामतः आलस्य तथा आत्म केंद्रित प्रवृत्ति आ सकती है।


मूलाधार चक्र की सकारात्मक उपलब्धियां स्फूर्ति, उत्साह और विकास हैं। नकारात्मक गुण हैं सुस्ती, निष्क्रियता, स्वार्थी और अपनी शारीरिक इच्छाओं द्वारा प्रभावित होना। मूलाधार-चक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है, जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है। इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है। इसके अंदर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की चार पंखुड़ियां नियत हैं। ये पंखुड़ियां अक्षरों से युक्त हैं- स, ष, श, व। यहां के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं। जो साधक साधना के माध्यम से कुण्डलिनी जागृत कर लेता है अथवा जिस साधक की स्वास-प्रस्वास रूप साधना से जागृत हो जाती है और जागृत अवस्था में उर्ध्वगति में जब तक मूलाधार में रहती है, तब तक वह साधक गणेश जी की शक्ति से युक्त व्यक्ति हो जाता है।

मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। पृथ्वी तत्व का अर्थ गंध है। इस चक्र मे ध्यान साधक को इच्छा शक्ति की प्राप्ति कराता है। इसी कारण ‘’ध्यानफल श्री विघ्नेश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये। मूलाधार चक्र को जागृत करने के लिए आपको कुछ नियमों का पालन करना होता है तभी आप इस चक्र को जागृत करने में सक्षम बन सकते हैं।

Tuesday, September 12, 2023

हिंदुत्व का सही अर्थ समझाया सद्गुरूनाथ जी महाराज ने

ऊँ नमः शिवाय। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’जो सत्य है वह ब्रह्म है-ब्रह्म अर्थात परमात्म। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र आत्म तत्व है जो सुंदरम है वही परम प्रकृति है। अर्थात परमात्मक शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है-हिंदुत्व।

शिव है प्रथम और शिव ही हैं अंतिम। शिव है सनातन धर्म का परम कारण और कार्य। शिव को छोड़कर अन्य किसी में मन रमाते रहने वाले सही नहीं है। शिव ही हैंार्म की जड़। शिव से ही धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष है। सभी जगत शिव के ही ष्रण में है, जो शिव के प्रति शरणागत नहीं है वह प्राणी दुख के गहते गर्त में डूबता जाता है। जाने अनजाने शिव का अपमान करने वाले को प्रकृति कभी क्षमा नहीं करती है। 

लंबी-लंबी खूबसूरत जिनकी जटाएं है, जिनके हाथ में पिनाक धनुष है, जो सत स्वरूप है अर्थात सनातन हैं,  दिव्य गुणसम्पन्न, उज्जवल स्वरूप होते हुए भी जो दिगम्बर है। जो शिव नागराज वासुकी का हार पहने हुए हैं, वेद जिनकी बारह रूद्रों में गणना करते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं उन शिव का रूप विचित्र है। अर्धनग्न शरीर पर भभूत मले जटाधारी, गले में रूद्राक्ष और सर्प लपेटे, तांडव नृत्य हैं तथा नंदी जिनके साथ रहता है। इनके जन्म के बारे में कोई नहीं बता सकता वे स्वयंभू माने गए हैं।  

वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन- सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत- यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।

  वेदों , स्मृतियों , पुरणों में   शिव पुराण में भगवान शिव सृष्टि और प्रलय का रूप  है । शिव पुराण और लिंग पुराण में  शिव अजन्मा और जीवों , वनस्पतियों , जंतुओं   देवों  की उत्पत्ति एवं सृष्टि  कारक  है । शिव के अट्ठाईस अवतारों के संबंध में  शिव पुराण के  " वायवीय संहिता " और लिंगपुराण में वर्णित है। ब्रह्मा,  विष्णु  और  रुद्र    कारणात्मा और  चराचर जगत् की सृष्टि,  पालन और  संहार और  साक्षात्  महेश्वर  से प्रकट हुए हैं ।

Monday, September 11, 2023

प्रार्थना का फल अविश्वसनीय रूप से अमूल्य



सत्संग के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराज ने प्रार्थना के महत्व पर प्रकाश डाला। कहा कि दीन-दुखियों के लिए भगवान के द्वार सदा ही खुले रहते हैं लेकिन याचक के दिल में सही भावना होनी चाहिए। कभी भी भगवान की भक्ति व्यर्थ नहीं जाती। भगवान तो सिर्फ भाव के भूखे होते हैं। तभी तो भगवान श्रीराम ने शबरी के जूठे बेर खाने में थोड़ाी सी भी हिचकिचाहट नहीं दिखाई। शबरी के वर्षों की तपस्या को भगवान श्रीराम ने पूरी की। आप भी अगर निष्ठा भाव से भगवान की पूजा और प्रार्थना करें तो कोई शंका नहीं है कि भगवान आपकी पुकार को न सुनें।
 

मनुष्य कर्म करता है. मनुष्य धन, सफलता, प्रसिद्धि या प्रेम की महिमा से जीवन को सुखी बनाने की इच्छा रखता है, लेकिन हर किसी की इच्छा पूरी नहीं होती है। दुख की घड़ी में ही भगवान को याद करना मानव स्वभाव है। जीवन के कठिन समय में वह आराध्य की शरण में पहुंचकर प्रार्थना करता है। इष्ट की जयजयकार करो. आत्मा से इस हृदय की बातचीत को प्रार्थना कहते हैं। कभी-कभी जीवन में ऐसी अप्रत्याशित घटना घटित हो जाती है कि इंसान द्वारा फेंके गए सारे पासे उलट जाते हैं, ऐसे समय में इंसान हार-हारकर थक जाता है और अंततः भगवान के सामने समर्पण कर देता है।

प्रकृति के प्रकाश में इतनी शक्ति है कि वह हमें पूनम से भर देती है लेकिन यह आवश्यक है। हम जानते हैं कि प्रार्थना का फल अविश्वसनीय रूप से अमूल्य है। प्रार्थना के माध्यम से व्यक्ति अनंत ज्ञान, अनंत शक्ति, आत्मा की शुद्धि और ईश्वर की उपस्थिति का अनुभव कर सकता है। प्रार्थना डूबते को बचाने वाली और बचाने वाली है।


हालाँकि, हर किसी को यह अविश्वसनीय शक्ति नहीं मिलती है। दुःख और पीड़ा से पीड़ित भाविका आराध्या के पास जाती है लेकिन सभी की प्रार्थनाएँ सफल नहीं होती हैं। चूँकि प्रकृति उसकी प्रार्थना नहीं सुनती, इसलिए निराश व्यक्ति को खाली हाथ लौटना पड़ता है। प्रार्थना की असीम शक्ति का लाभ उठाने के लिए कुछ नियम हैं, जिनका पालन करने से प्रार्थना अवश्य पूरी होगी और भविष्य खुशियों से भर जाएगा। 

Sunday, September 10, 2023

गुरू से ज्ञान प्राप्त करने के लिए एकनिष्ठ होना जरूरी: सद्गुरूनाथ जी महाराज

 सत्संग के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराज अपने भक्तों को अपने प्रकार से कष्ट दूर करने के उपाय बताते हैं उनकी वाणी में ऐसा जादू हैं जो हर लोगों के सीधे दिल में उतर जाती है। बिल्कुल सीधे शब्दों में वे अपनी बात कहते हैं शिवमहापुराण, विष्णुपुराण, वैदिक शास्त्र की ऐसी गूढ़ बातें सिर्फ सद्गुरूनाथ जी ही बता सकते हैं। 


गत दिनों सत्संग के दौरान उन्होंने बताया कि  साधना और सिद्धि जब दोनों का मिलन होता है, तभी सिद्धि पूर्ण रूप से प्राप्त हो पाती है और स्थायी भाव से साधक के पास स्थित रहती है। सिद्धि को संकलित कर अपने कार्यों में उपयोग करने हेतु निरन्तर साधना अनिवार्य है।  

साधना एक दिव्य भाव है।  इस भाव में साधक स्वयं को समर्पित कर देता है । यह साधना किसके लिए हो ? यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है । साधना का सीधा और सरल अर्थ है, पूर्ण रूप से समर्पित कर उसी विचार में ‘ध्यान’ लगाना , साधना में साधक अपने गुरु का सिर्फ आदेश मानता है। सिर्फ सच्चे गुरू ही साधना के उच्चतम शिखर पर आपको पहुंचा सकते हैं। तब मन को शान्ति मिलती है, मन को एक आधार मिलता है , कष्टों में एक मार्ग दिखलाई देता है।  यह एक कटु सत्य है, कि जीवन सीधा सरल  नहीं है !

 जीवन में तो अनेक परेशानियां हैं, कष्ट हैं, बाधाएं हैं , अड़चने हैं, पग पग पर शत्रु वार करने के लिए तैयार हैं ! वह तो हमारी पीठ पीछे सेकड़ों प्रकार के षडयंत्र तैयार कर लेते हैं और हमारा सारा जीवन तनाव , बाधाओं , अड़चनो, रोगी जीवन  और परेशानियों से जूझते हुए व्यतीत होने लगता है ....और हम जीवन में जो कुछ करना चाहते हैं , वह चाहकर भी नहीं कर पाते हैं , फ़िर हम किस प्रकार इस जीवन में उत्साह , उमंग और जोश लायें ? वह कौन सा ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम दिखा सकें कि एक सामान्य परिवार में उत्पन्न होकर भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं ! यह ‘बहुत कुछ’ कर देने की क्षमता केवल निरंतर साधना द्वारा सम्भव है ।

 नींद और ध्यान एक बार इसमें प्रवेश करने के बाद हम कहीं भी पंहुच सकते हैं।जीवन तो आपके हाथ में है ! सामान्य मनुष्य बस जीवन जी कर बिता लेता है ! आप जाकर देखलें सड़क पर सब सामान्य है।  उनमे कुछ विशेषता है ही नहीं , उन्हें पता ही नहीं कि उनके आस पास कौन रहता है ? कौन चलता है ? साधक भी सामान्य जीवन जीता है। 

गुरू से प्राप्त साधना को करने के लिए साधक को स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। उसके लिए एकनिष्ठ होना पड़ेगा ! किनारे पर खड़े होकर नदी को पार नहीं किया जा सकता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारे वेद पुराण आदिकाल से ही कल्याणकारी जीवन व्यतीत करने का मार्ग निर्देशन करते रहे हैं ! वर्तमान युग में प्राचीन मान्यताओं के प्रति हमारी आस्थाहीनता अनेक प्रकार के कष्टों को जन्म दे रही है , परिणामस्वरुप धन धान्य सुख सुविधाओं के लिए हमारा मन इधर उधर भटकता है।

 

Saturday, September 9, 2023

जीवन में दुख ,कारण और निवारण

 जब आप आज इंसानों पर नजर डालते है तो परमार्थ के मार्ग पर चलने के बावजूद लोग परेशान है,दुखी है,तकलीफ में हैं,आप अगर पूछेंगे तो कृपा है,आशीर्वाद है,आनंद है जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं  और बाद में किसी महात्मा,किसी भागवत स्थान पर आशीर्वाद मांगते हुए ,कोई मंत्र,कोई तावीज लेकर ,दान पुण्य कर अपने  दुख दूर करने की कोशिश करते दिख जाते हैं।

कभी आपने सोचा है क्यों है जब ऐसा कहा जाता है की ईश्वर की शरण में सब दुख समाप्त हो जाते हैं फिर इंसानी  जीवन में दुख क्यों ।

अपने आप से प्रश्न पूछिए ,सभी का जवाब आपके पास है, कभी अपने अंदर झांक कर तो देखिए।अगर प्राप्त हुई चीज पर मालिकाना हक रखेंगे तो भार तो चढ़ेगा ही ,उसका खर्चा ,उसका रखरखाव,उसकी टूटफूट सब आपने अपने   जिम्मे डाल ली है जबकि यह आपको विशेष सुविधा दी गई थी इस जीवन भ्रमण के लिए ।जैसे कोई अधिकारी सरकारी काम से जाए तो उसके आवास ,उसकी गाड़ी सबकी सुविधा प्रदान की जाती है उस अधिकारी पर यात्रा का कोई भार नहीं होता वो उस समय का सदुपयोग करता है यात्रा का आनंद लेता है और लौट जाता है।अगर आप स्वयं  को दी गई सुविधाओं और अधिकारों का दुरुपयोग करोगे तो सजा के हकदार हो जाओगे फिर वो यात्रा आनन्दायक न होकर दुखमय हो जायेगी।

अपने आसपास कुल प्रकृति पर नजर डालिए सब इस संसार में आपको कुछ न कुछ दे रहे है।सूर्य आपको रोशनी और ऊष्मा दे रहा है,वायु आपको गति और सांस प्रदान कर रहा है,जल आपको ठंडक के साथ कुल प्रकृति की प्यास बुझा रहा है,धरती आपको स्थायित्व के साथ अपनी ऊर्जा शक्ति से जीवन दे रही है वनस्पति प्रदान कर आपकी भूख शांत कर रही है और प्राणियों में श्रेष्ठ कहे जाने वाले मानव ने कैसे सोच लिया उसे सिर्फ ग्रहण करना है , संग्रह करना है जो दुख और तकलीफ का कारण है उसे भी देने का कार्य दिया गया था प्रेम बांटने का, मीठे बोल बांटने का,पर जब देने वाला अपने भाव के उलट काम करने लगे तो उससे गलत कर्म होंगे ही वो संग्रहण करने के लिए किसी का अधिकार छीनेगा उसे प्रकृति के नियम की अवहेलना होगी और संतुलन के लिए उसे वापस देना होगा कई गुना बढ़ाकर ,वापस देने में तकलीफ होगी इसी लिए महात्माओं ने इंसान को जगाया है।


 हमेशा की दान दीजिए प्रेम का ,मीठे बोलो का ,किसी का दुख दूर कीजिए क्योंकि आपको भी प्रकृति प्रदान कर रही आपने भी इस संतुलन को बनाए रखना है आप भी ऐसा कर्म करेंगे तो कोई बंधन नहीं होगा जीवन में दुख उत्पन्न नहीं होगा ,जो हो रहा है उसे स्वीकार कीजिए क्योंकि जब आपकी गलती का संशोधन किया जाता है उसे आप जीवन में अनुभव करते है उसे आपबदुख का नाम दे दे देते हैं पर यह तो प्रकृति का संतुलन बनाने का विधान है।धन्यवाद कीजिए इस सर्वशक्तिमान ईश्वर का जिसकी कृपा से यह प्रकृति सब प्रदान कर रही है ,सहर्ष स्वीकार करें और सहर्ष बांट दीजिए ,अपना योगदान जारी रखिए आपके जीवन में सुख और आनंद कायम रहेगा ,अपने कर्म जागृत रह कर करिए आप देखेंगे आपका जीवन परिवर्तित हो जाएगा इसमें से दुख और तकलीफ गायब हो जाएगी और आपका आनंद में रहकर जीवन यात्रा का  लाभ उठाएंगे ।

इस असीम कृपालु ईश्वर से प्रार्थना है हर मानव जागृत रहे ,प्रेम से भरपूर रहे ,सबका जीवन आनंददायक हो सब स्वस्थ रहे और जो जीवन में घटित हो रहा है उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करें ।जीवन में गलती संशोधन हो रहा हो तो उसे देख कर हर्षित रहे की कृपालु ईश्वर आपकी जीवन यात्रा को आनंदित बनाने का उपाय कर रहा है।


Friday, September 8, 2023

भगवान शिव से जुड़े अनेक रहस्यों से पर्दा हटाया गुरूवर ने

आध्यात्मिक गुरू एवं दिव्यदर्शी सद्गुरूनाथ जी महाराज भगवान भोलेनाथ के अनन्य भक्त माने जाते हैं। लोगों का मानना है कि महादेव पर इन पर विशेष कृपा है। तभी तो ये जिन पर भी अपना ममतामयी हाथ रख देते हैं उनके दुःख स्वतः दुर हो जाते है। शिवमहापुराण के दौरान जब वो बोलते हैं तो पूरा मंडल परिसर में भगवान भोलेनाथ के होने का आभास हजारों लोगों को हो चुका है। पिछले दिनों सद्गुरूनाथ जी महाराज ने  भगवान शिव से जुड़े हुए अनेक प्रश्नों का उत्तर अपने शिष्यों को दिया और कहा कि इस चराचर जगत में शिव से बड़ा कोई नहीं है। 

प्रश्नः गुरूवर ध्यान के देवता कौन है?

सद्गुरूनाथ जी: ध्यान के देवता भगवान शिव हैं।  वे आदियोगी के रूप में भी जाने जाते हैं और ध्यान, योग और कला के संरक्षक देवता के रूप में उन्हें मान्यता प्राप्त है। भगवान शिव के आदियोगी रूप में वे समस्त जगत की ध्यान-धारण की प्रेरणा और मार्गदर्शन करते हैं।


प्रश्न: भगवान शिव किसका ध्यान करते है?

सद्गुरूनाथ जी:  भगवान शिव किसी का ध्यान नहीं करते । वे सदैव समाधिग्रस्त रहते हैं। उनका ध्यान केवल और केवल अपने आप पर होता है, जहां वे निरंतर ध्यान और ध्येय  की एकता में रहते हें। उनका समाधान मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति का प्रतीक है, जहां वे अविकारी, अनंत और पूर्णता के साथ स्थित होते हैं इसलिए शिव जी किसी व्यक्ति, देवता या अन्य किसी ध्येय पर ध्यान नहीं करते हैं उनका ध्यान केवल उनके स्वयं आत्मस्वरूप में होता है। 


प्रश्न: भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल ही क्यों?

सद्गुरूनाथ जी: त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।


प्रश्न - क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?

सद्गुरूनाथ जी: भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।
साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।


Thursday, September 7, 2023

डिप्रेशन का बिल्कुल सटीक उपाय बताया सद्गुरूनाथ जी महाराज ने

सद्गुरूनाथ जी महाराज की कथा सुनने वाले श्रद्धालुओं की संख्या दिनों दिन बढ़ती जा रही है. सद्गुरूनाथ जी महाराज सिर्फ शिवमहापुराण की कथाएं ही नहीं सुनाते, बल्कि जीवन की कठिनाइयों को सरल करने के उपाय भी बताते हैं. सद्गुरूनाथ जी महाराज ने डिप्रेशन को लेकर स्पष्ट किया कि वर्तमान परिस्थितयों में शिक्षा, नौकरी, व्यवसाय या घर कहीं भी मनुष्य तनाव या डिप्रेशन में है. दबाव हर जगह है. उस प्रेशर से दूर रहना सीखना चाहिए. अगर स्कूल में हैं तो पढ़ाई तो करनी ही पड़ेगी, तो सबसे अच्छा उपाय है खुश होकर पढ़ें।

सद्गुरूनाथ जी महाराज बताते हैं कि शिव के गले में विष होने पर भी भगवान भोलेनाथ अलमस्त होकर साधना में रहते हैं. इसलिए हृदय से प्रसन्न रहेंगे तो आनंद की प्राप्ति होगी. मन को छोटा करके नहीं बैठना चाहिए.

उन्‍होंने आगे बताया कि भगवान भोलेनाथ का रूप यह संदेश देता है कि जीवन का विष पीना है, लेकिन उसे कंठ में रखिए शरीर में नहीं उतारना है. उन्होंने कहा कि संसार में किसी को भी मृत्यु की तारीख या समय नहीं मालूम होती है. यदि आप परमात्मा से कहें कि संसार में मेरे आने की सूचना 9 महीने पहले दे देते हैं, तो जाने की सूचना 9 मिनट पहले दे दे. मगर ऐसा संभव नहीं होता है इसलिए खुश होकर जिएं.।

विचारों से ही भाग्य बनते और बिगड़ते हैं, इसलिए कहा गया है कि एक विचार किसी का भी भाग्य परिवर्तित कर सकता है। बिना उचित विचार शक्ति के जीवन शून्य है। हम मानव हैं, हमारा मन है, हमारे पास बुद्धि है इसलिए विचार भी है, सही विचार सफलता और गलत विचार असफलता दिलाता है। विचार शक्ति को जागृत कर हम अपने जीवन में उचित परिणाम प्राप्त कर सकते हैं।


योग, साधना और ध्यान के द्वारा मन को नियंत्रित कर सफलता का शिखर प्राप्त किया जा सकता है। धार्मिक कृत्यों का नियमपूर्वक पालन करने से विचारों की गुणवत्ता में परिवर्तन होता है। यह परिवर्तन कर्म के स्वरुप में परिवर्तन लाता है, जिससे शुभाशुभ परिणाम नियंत्रित होते हैं। विचारों की गुणवत्ता में सुधार होने पर मन में स्थिरता आती है, किसी भी धार्मिक ग्रंथ जैसे वेद, उपनिषद आदि द्वारा प्राप्त ज्ञान को जब हृदयंगम किया जाता है तो उससे प्राप्त आध्यात्मिक उर्जा के कारण व्यक्ति इस लोक में सफलता प्राप्त कर अपना परलोक भी सुधार लेता है।

Wednesday, September 6, 2023

गुरूनिष्ठा और भक्तिभाव से ही मानव श्रेष्ठ बनता है: सद्गुरूनाथ जी महाराज

सद्गुरूनाथ जी महाराज सत्संग के दौरान कहते है कि मनुष्य के अंतःकरण में अनेक प्रकार के मनोविकार होते हैं, जिनके वशीभूत होने के कारण उसे वास्तविकता के दर्शन नहीं होते। वह अहंकार में रहता है उसमें गलत सही का विवेक नहीं रहता। ये मनोविकार दूर होता है गुरू से ज्ञान प्राप्त होने पर। 


मन से प्रेम और भक्ति उड़ गई ईर्ष्या विरोध आ गया तो समझ लेना चाहिए कि माया ने अपना जाल बिछा दिया है, मन मलिन हो गया है और पाप कर्म बनते जा रहे हैं। यदि शिष्य कोई खोट, कर्म करता है तो सतगुरु उसे बुराई करने से रोकते हैं। सत्संग में सब बातें कही जाती हैं जिससे शिष्य अपने आप को सुधार ले और माफी मांग ले कि आइन्दा ऐसी गल्ती नहीं करेगा। यदि बार-बार समझाने पर भी वो नहीं मानता है तो ऐसे व्यक्ति से भगवान भी मुंह मोड़ लेते हैं। 


जो गुरु का आदेश हो उसका पालन करना गुरु की सेवा है इसी को गुरु भक्ति कहते हैं धन  की सेवा करो और समझो कि गुरु प्रसन्न हो गए तो ऐसी बात नहीं है । नाशवान वस्तुओं को देकर गुरु की प्रसन्नता नहीं हासिल की जा सकती । वचन का पालन करो और भजन करो तो ये आत्मिक सेवा है और उत्तम सेवा है।

ऐसा करने से गुरु की दया तुम पर बरसेगी और जीवात्मा अन्धेरे से निकलकर प्रकाश में खड़ी हो जाएगी, उसकी आंख खुल जाएगी और गुरु का दिव्य स्वरूप अन्तर में प्रकट हो जाएगा। इसलिए सबसे पहले तुम यही सेवाकरो कि गुरु के आदेश का पालन करो । जो भी हुक्म हो उसे सिर माथे रखकर अपना कर्तव्य निभाओ। 

अगर तुम गुरु से प्यार करते हो, अगर तुम्हारा प्रेम गुरु से है तो तुम्हें वही करना चाहिए जो उसका हुकम हो या जो जो उसे अच्छा लगे। दूसरों के पीछे पडना परमार्थी का काम नहीं, ऐसा करने से वक्त बर्बाद होता है । ऐसी हालत तो दुनियांदारों की होती है । परमार्थी को तो अपने पीछे पड़ना चाहिए जिससे अपना सुधार हो ।

दुनियाँ के कामों के लिए जितना जरुरी हो उतना समय दो बाकी समय अधिक से अधिक परमार्थ के चिन्तन में और भजन में लगाओ ।

Tuesday, September 5, 2023

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया कैसे जिएं सफल और सार्थक जीवन

श्रीकृष्णजन्माष्टमी पर विशेष: 

श्रीकृष्ण एक ऐसा ही आदर्श चरित्र है जो अर्जुन की मानसिक व्यथा का निदान करते समय एक मनोवैज्ञानिक, कंस जैसे असुर का संहार करते हुए एक धर्मावतार, स्वार्थ पोषित राजनीति का प्रतिकार करते हुए एक आदर्श राजनीतिज्ञ, विश्व मोहिनी बंसी बजैया के रूप में सर्वश्रेष्ठ संगीतज्ञ, बृजवासियों के समक्ष प्रेमावतार, सुदामा के समक्ष एक आदर्श मित्र, सुदर्शन चक्रधारी के रूप में एक योद्धा व सामाजिक क्रान्ति के प्रणेता हैं। उनके जीवन की छोटी से छोटी घटना से यह सिद्ध होता है कि वे सर्वैश्वर्य सम्पन्न थे। धर्म की साक्षात् मूर्ति थे। कुशल राजनीतिज्ञ थे।  

श्रीकृष्ण का व्यक्तित्व एवं कृतित्व नेतृत्व एवं प्रबंधन की समस्त विशेषताओं को समेटे बहुआयामी एवं बहुरंगी है, यानी राजनीतिक कौशल, बुद्धिमत्ता, चातुर्य, युद्धनीति, आकर्षण, प्रेमभाव, गुरुत्व, सुख, दुख और न जाने और क्या? एक देश-भक्त के लिए श्रीकृष्ण भगवान तो हैं ही, साथ में वे जीवन जीने की कला एवं सफल नागरिकता भी सिखाते है। 


जिस तरह जीवन के प्रत्येक कार्य में सुनिश्चित सफलता के लिये सही प्रबंधन अति आवश्यक है, उसी तरह सही ढंग से जीने एवं सार्थक जीवन के लिये भी सही प्रबंधन जरूरी है। श्रीकृष्ण ने मैंनेजमेंट गुरु की भूमिका निभाते हुए सफल एवं सार्थक जीवन जीने के प्रबंधन सूत्र दिये, जो सदियों से सम्पूर्ण मानवजाति का पथ-दर्शन कर रहे हैं। श्रीकृष्ण के प्रबंधन नीति की खासियत यह है कि उनकी भावना और विवेक एक दूसरे का पूरक है। 


पूरे महाभारत युद्ध के दौरान कहीं भी श्रीकृष्ण ऊंहापोह की स्थिति में नजर नहीं आये। एक ही व्यक्ति में अनेक गुणों, विशेषताओं एवं कौशल का समावेश तभी हो सकता है, जब वह प्रबंधन में निष्णात हो। उन्होंने अपने व्यक्तित्व की विविध विशेषताओं से भारतीय-संस्कृति में उच्च महाप्रबंधक का पद प्राप्त किया। एक ओर वे राजनीति के ज्ञाता, तो दूसरी ओर दर्शन के प्रकांड पंडित थे। धार्मिक, राजनैतिक एवं सामाजिक जगत् में भी नेतृत्व करते हुए ज्ञान-कर्म-भक्ति का समन्वयवादी धर्म उन्होंने प्रवर्तित किया। अपनी योग्यताओं के आधार पर वे युगपुरुष थे, जो आगे चलकर युवावतार के रूप में स्वीकृत हुए।


उन्हें हम एक महान् क्रांतिकारी नायक के रूप में स्मरण करते हैं। वे दार्शनिक, चिंतक, गीता के माध्यम से कर्म और सांख्य योग के संदेशवाहक और महाभारत युद्ध के नीति निर्देशक थे किंतु सरल-निश्छल ब्रजवासियों के लिए तो वह रास रचौया, माखन चोर, गोपियों की मटकी फोड़ने वाले नटखट कन्हैया और गोपियों के चितचोर थे। गीता में इसी की भावाभिव्यक्ति है- हे अर्जुन! जो भक्त मुझे जिस भावना से भजता है मैं भी उसको उसी प्रकार से भजता हूं। 


श्रीकृष्ण का संपूर्ण जीवन भारत के सांस्कृतिक राष्ट्रवाद का पर्याय है। उनके आदर्शों के माध्यम से ही विश्व ने भारत को जाना है। उनके आदर्शों की पुनर्प्रतिष्ठा से विश्व फिर से भारत को जानेगा। राजनैतिक सूक्ष्म दृष्टि, दुष्टों, राष्ट्रद्रोहियों, अपराधियों एवं भ्रष्टाचारियों का दलन, वचन पालन का संकल्प, राष्ट्रहितार्थ आत्मसमर्पण का व्रत, निष्पाप लोगों की मुक्ति, विषमताओं का उन्मूलन, विभेदों में सामंजस्य, परस्पर शत्रुता का निवारण, स्वयं स्वीकृत आत्मसंयम, राष्ट्र कार्यों में सबका सहयोग, राजसत्ता पर धर्मसत्ता का अंकुश और इन सबकी पूर्ति के लिए सत्ता का भी त्याग इत्यादि श्रीकृष्ण के प्रबंधन-गुण भारत के राष्ट्रीय जीवन एवं सांस्कृतिक मूल्य हैं। 


 

जबलपुर कथा का दूसरा दिन: गुरूदेव ने बताया जीवन में खुशहाली लाने के उपाय

जबलपुर: परम पूज्य सतीश सद्गुरूनाथ जी महाराज द्वारा पावन नवरात्रि पर शिवमहापुराण कथा के द्वारा भक्ति की अविरल जलधारा बहा रहे हैं। कथा के दूसर...