गत दिनों अपने प्रवचन के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराज ने लोगों की जिज्ञासा को शांत करते हुए भाग्य और कर्म का इतना सटीक अर्थ बताया कि लोग के मन में आ रहे सारे प्रश्न का जवाब एक साथ मिल गया। सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि संसार में बहुत से लोग कहते देखे जाते हैं कि इसके भाग्य में तो यही लिखा हुआ था या यह तो होना ही था परन्तु ऐसा कहना सही नहीं है। पूर्वकृत कर्मों का फल भाग्य अवश्य है परन्तु सब कुछ जो कुछ भी संसार में घटित होता है वह सब पूर्वकृत् कर्मों का फल नहीं होता जैसे किसी की अल्पायु में सडक दुर्घटना में मृत्यु हो जाती है तो वह किसी अन्य की गलती या स्वयं उसकी गलती या अकस्मात् हुए संयोग का परिणाम होता है। यह अलग बात है कि यहां गलती करने वाले का नया कर्म बनता है जो कालान्तर में परिणाम देता है। इसी प्रकार की स्थिति अन्य उदाहरणों में भी समझनी चाहिए।
फिर मन में एक प्रश्न यह उठता है कि यह कैसे पता चले कि कहां पूर्वजन्मकृत कर्मों का फल मिल रहा है कहां इसी जन्म में किए अपने या किसी अन्य के द्वारा की गई सुकृत् या दुष्कृत् का फल या परिणाम मिल रहा है तो इसका सीधा सा उत्तर यही है कि शास्त्रों के अनुसार पूर्वजन्म कृत कर्मों का फल जीव को जाति अर्थात् मनुष्य जाति, पशु जाति,प क्षी जाति आदि के रुप में, आयु अर्थात् प्राप्त योनि के अनुसार आयु व भोग आदि के रुप में मिलता है। दूसरे इसे पहचानने का एक सरल उपाय यह है कि जिस फल की प्राप्ति के लिए हमने इस जन्म में कोई परिश्रम नहीं किया फिर भी वह फल हमें इस जन्म में प्राप्त हो रहा है तो समझना चाहिए कि वह पिछले जन्म के कर्म का फल है क्योंकि कर्म के बिना फल प्राप्ति असम्भव है। यही पूर्वकृत कर्मों के फल अर्थात् भाग्य के विषय में समझना चाहिए।
पुरुषार्थ का नियम है और भाग्य उसका अपवाद। अपवादों को भी अस्तित्व तो मानना पड़ता है, पर उनके आधार पर कोई नीति नहीं अपनाई जा सकती, कोई कार्यक्रम नहीं बनाया जा सकता। कभी- कभी स्त्रियों के पेट से मनुष्याकृति से भिन्न आकृति के बच्चे जन्म लेते देखे गए हैं। कभी- कभी कोई पेड़ असमय में ही फल-फूल देने लगता है, कभी-कभी ग्रीष्म ऋतु में ओले बरस जाते हैं, यह अपवाद है। इन्हें कौतूहल की दृष्टि से देखा जा सकता है, पर इनको नियम नहीं माना जा सकता। इसी प्रकार भाग्य की गणना अपवादों में तो हो सकती है, पर यह नहीं माना जा सकता कि मानव जीवन की सारी गतिविधियाँ ही पूर्व निश्चित भाग्य-विधान के अनुसार होती हैं। यदि ऐसा होता तो पुरुषार्थ और प्रयत्न की कोई आवश्यकता ही न रह जाती। जिसके भाग्य में जैसा होता है, वैसा यदि अमिट ही है, तो फिर पुरुषार्थ करने से भी अधिक क्या मिलता और पुरुषार्थ न करने पर भी भाग्य में लिखी सफलता अनायास ही क्यों न मिल जाती?
भाग्य क्या है? यह अपने आप में ही एक बड़ा प्रश्न है। सबके लिए भाग्य की परिभाषा अलग अलग हो सकती है। जैसे कुछ लोगों के लिए भाग्य के अंतर्गत धन-संपत्ति आ सकती है, कुछ सुख शांति होने पर खुद को भाग्यशाली मानते हैं, तो कुछ कर्म के आधार भाग्य की उत्पत्ति मानते हैं। यानि जो लोग कहते हैं की कर्म करते हैं पर भाग्य साथ न देता तो वो पूरी तरह कर्मठ नहीं है। एक कहावत है कि समय से पहले और भाग्य से अधिक कभी किसी को कुछ नहीं मिलता। लेकिन ज़रा सोचिये 84 लाख योनियों में मनुष्य योनी में जन्म भाग्य की ओर इशारा नहीं करता, संसार में कई ऐसे विरले पड़े हैं जिनको पारिवारिक प्रेम नहीं मिला लेकिन समाज में उन्हें पूर्ण सम्मान प्राप्त है, यह भी भाग्य का ही एक रूप माना जा सकता है.
वास्तव में भाग्य-यश, प्रेम, धन, स्वास्थ्य; इन सभी रूपों में या किसी एक रूप में आपके पास हो सकता है. ईश्वर सभी को योग्यता व कर्मानुसार भाग्य प्रदान करता ही है। अतः जरूरत है कि हम हमारे हिस्से में आए आशीर्वाद को सस्नेह ग्रहण करें और ईश्वर से संतोषरूपी धन की याचना करें, क्योंकि ‘हर स्थिति में संतुष्ट रहने से ही सुख प्राप्त होता है.’

No comments:
Post a Comment