Tuesday, October 17, 2023

जबलपुर कथा का दूसरा दिन: गुरूदेव ने बताया जीवन में खुशहाली लाने के उपाय

जबलपुर: परम पूज्य सतीश सद्गुरूनाथ जी महाराज द्वारा पावन नवरात्रि पर शिवमहापुराण कथा के द्वारा भक्ति की अविरल जलधारा बहा रहे हैं। कथा के दूसरे दिन भी काफी संख्या में लोगों ने सद्गुरूनाथ जी महाराज के मुखारविन्द से कथा का श्रवण किया। गुरूदेव ने कहा कि शिवमहापुराण कथा को जो भी शिवभक्त पूरी श्रद्धा के साथ श्रवण करता है उसके सारे दुःख अनायास ही दूर हो जाते हैं। देवाधिदेव महादेव की उस पर विशेष कृपा बरसती है। 


गुरूदेव ने कहा कि कभी भी जीवन में कोई भी दुःख आए आप भोलेनाथ पर अटूट विश्वास रखें। कोई भी ऐसी समस्या नहीं है। जिसे भोलेनाथ दूर न कर सकें। जीवन में अपमान-सम्मान जो भी आपको मिले आप सबकुछ भोलेनाथ के उपर छोड़ दें।  जिनको जीवन में सम्मान कम मिला हो उनका हर छोटी से छोटी बात पर अपमान हो जाता है। मेरे तरफ देखा नहीं, मुझसे ऐसा क्यों करवाया, मुझे अनदेखा किया। हर बात में उनका अपमान हो रहा है। अगर सम्मान पाना है तो पहले झुकना सीखिए जितना ज्यादा झुकोगे, जितना ज्यादा सहज बनोगे। उतना ज्यादा सम्मान मिलेगा। ये बिल्कुल अटल सत्य है। 

गुरूदेव ने कहा कि लोग पैसे के पीछे इतनी हाय-तौबा मचाए रखते हैं, लेकिन लक्ष्मी माता की याद सिर्फ दीवाली के समय आती है। जब उनकी विधिवत पूजा की जाती है। मानव हर चीज अब अपनी सुविधा अनुसार करने लगा है। ये कैसी विडंबना है। लक्ष्मी और गणेश जी की विधिवत पूजा रोजना करनी चाहिए। जिससे माता लक्ष्मी आप पर प्रसन्न रहे। शिव महापुराण में भी लक्ष्मी की महत्ता काफी बताई है। लेकिन लक्ष्मी जी की पूजा में हाथी जरूर होना चाहिए। जब सामाजिक उत्थान के लिए आप पूजा कर रहे हो तो उल्लू पर बैठी हुई मां लक्ष्मी की पूजा दीवाली में करें आपके सारे काम आसानी से हो जाएंगे। गुरूदेव ने कहा कि अगर आप स्थायी लक्ष्मी की कृपा पाने चाहते हैं तो करवा चौथ से लेकर दीपावली तक घर में घी का दीया जरूर जलाएं। आपके घर में सुख-सौभाग्य एवं खुशियां जरूर आएगी। 


Saturday, October 14, 2023

नवरात्रि उत्सव का जीवन में आध्यात्मिक महत्व

नवरात्रि जिसमें नव दुर्गा की आराधना की जाती है। नवरात्रि पर्व की नौ रात्रियाँ प्रकृति के द्वारा मनुष्य को दिया गया वह भेंट हैं। जब मनुष्य अपने भीतर मलिनता को हटाकर आध्यात्म की ओर अग्रसर होता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य के भतर इन नव-रात्रियों में नव-निर्माण का आध्यात्मिक कार्य गतिशील होता है। 

यह सृष्टि चक्रीय-धारा में चल रही है। किसी सीधी रेखा में नहीं। प्रकृति के द्वारा हर वस्तु का नवीनीकरण हो रहा है। हर रात्रि के बाद दिवस है तो दिवस के बाद रात्रि। हर पतझड़ के बाद बसंत आती है तो बसंत के बाद पतझर निश्चित है। यहाँ जन्म और मृत्यु भी चक्राकार है। सुख के बाद दुःख तो दुःख के पश्चात सुख भी निश्चित चल रहा हे। प्रकृति की स्थूल से सूक्ष्म तक की सभी रचनाएं पुरातन से नीवन से पुरातन के चक्रीय मार्ग का ही अनुसरण कर रही है। नवरात्रि का त्यौहार भी मनुष्य के मन व बुद्धि को संसार की  दौड़ में से लौट कर स्वयं में खोने का निश्चित सुअवसर है। 


नवरात्रि उत्सव के चार मूलभूत साधन

संसार में भटकते चित्त को स्वयं के स्तोत्र तक वापिस लौटने के लिए मौन, प्रार्थना, सत्संग और ध्यान के मूलभूत आधार चाहिए। मौन हमारे मन की भटकन को दूर करता है तो प्रार्थना से यही मन ईश्वर में एकाग्र होने की चेष्टा करता है। सत्संग में ईश्वर के स्वरुप का सही निर्णय होता है और साधना का संपूर्ण मार्ग श्री गुरु सत्संग के माध्यम से ही उजागर करते हैं। ततपश्चात् ध्यान की सम्यक् विधियों के द्वारा मनुष्य अपने मूल स्तोत्र (सत-चित्त-आनंद) की ओर गमन करते हुए परम-रहस्य का साक्षात्कार करता है।

नवरात्रि नवीनीकरण का उत्सव

नवरात्रि का यह उत्सव मनुष्य के भीतर आंतरिक यात्रा कर के, नवीनीकरण को प्रकट करने का उत्सव है। यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति से उत्पन्न हुआ है, संचालित हो रहा है और उस एक ही शक्ति में विलय को प्राप्त होगा। इसी शक्ति को हम ‘आद्य शक्ति’ कहते हैं। इस शक्ति को असंख्य नाम-रूपों से पूजा गया है। कोई इसे मात्र ‘देवी’ कहता है तो कोई ‘शक्ति’। कोई देवी और शक्ति को दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी आदि के नाम और विविध रूप से पूजता है। परंतु हर मान्यता देवी को ‘माँ’ मानती है क्योंकि समस्त जड़ व चेतन पदार्थों की उत्पत्ति इस एक ही शक्ति में से हुई है और महा-विलय के पश्चात् सब कुछ इस एक शक्ति में ही खो जाता है।


नवरात्रि का उत्सव इस एक शक्ति, आद्य शक्ति को उजागर करने का सुअवसर है। वैसे तो यह शक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में सक्रिय है परंतु मनुष्य इस महा-रहस्य से अपरिचित है क्योंकि तमस-रजस-सत्त्व गुणों की त्रिगुणात्मकता में ही मनुष्य का मन उलझा हुआ है।

तमस-रजस-सत्त्व का शुद्धिकरण

नवरात्रि के यह नौ दिन हमारे मन में रहे इन तीन गुणों का शुद्धिकरण करने के दिन हैं। तमस-रजस-सत्त्व से गुंथी हुई मनुष्य की प्रकृति अज्ञानता और मोह के कारण परिभ्रमण में उलझी हुई है। इन नौ- दिनों में क्रमशः इन तीन प्रकृतियों में शुद्धिकरण कर के मनुष्य के भीतर नव-निर्माण की संभावना को दृढ़ करना है।

प्रथम तीन दिवस: तमस का विसर्जन

धर्म संस्कृति में नवरात्रि उत्सव के प्रथम तीन दिवस ‘देवी दुर्गा माँ’ की पूजा होती है। अध्यात्म संस्कृति में इन प्रतीकों का महत्व होने से ‘देवी दुर्गा माँ’ के रहस्य को समझ कर अपने भीतर शुद्धि करने के यह तीन दिवस हैं। ‘दुर्ग’ का अर्थ होता है पहाड़, पर्वत, शैल। मनुष्य के भीतर पहाड़ जैसा ही अहंकार, अज्ञान और आसक्ति का भण्डार पड़ा है। प्रथम तीन दिवस में मौन-प्रार्थना-सत्संग व ध्यान के चतुर्विध आयाम से मन के भीतर पड़े इस ‘तमस’ को जान कर इससे मुक्त होने की ‘आद्य-शक्ति’ को प्रार्थना करनी है। साथ ही साथ अध्यात्म पथ पर हम सद्गुरू व उनके बताए मार्ग के प्रति पर्वत की तरह अकंप श्रद्धा व निष्ठा से भरे रहे कृ ऐसी भाव-समृद्ध याचना करनी है।

Thursday, October 12, 2023

खून के रिश्तों को कलंकित करती स्वार्थ की काली छाया

खून पुकारता है!’, ‘खून पानी से गाढ़ा होता है’, ‘अपना-अपना होता है’ जैसे अनेक जुमले अचानक थोथे क्यों दिखाई देने लगे? ऐसा लगता है कि हम अपनी संस्कृति को भुला बैठे हैं अथवा आदर्शों को व्यवहार में उतारने के बजाय उनके गीत गाने तक ही सीमित रहे हैं। इन घटनाओं में यदि हम कन्या भ्रूण-हत्याओं और वैवाहिक संबंधों में बढ़ती दरार को भी शामिल कर दें तो तस्वीर काफी भयावह दिखाई देने लगेगी। इस जहरीले वातावरण का दोषी कौन है और इसका समाधान क्या है?

यह प्रश्न समाज के हृदय को आंदोलित करना चाहिए। आखिर, पारिवारिक रिश्तों के बीच कैक्टस कौन बो रहा है? किसकी नजर लगी है, मेरे देश को? यदि इस प्रश्न का उत्तर चाहिए, तो अपने ही मन को टटोलना होगा। क्या हम सचमुच अपने संबंधों के प्रति ईमानदार हैं? कहीं यह सब पिछले कुछ वर्षाें से टीवी चैनलों पर परोसी जा रही तड़क-भड़क, विकृत संस्कृति, कामुकता, विवाहेत्तर संबंधों को अनदेखा करने के परिणाम तो नहीं हैं? दुखद आश्चर्य यह है कि देश के एक वर्ग को इसकी रत्ती-भर भी चिंता नहीं हैं। पश्चिम की अमर्यादित संस्कृति को यहां फलने-फूलने का मौका दिया जा रहा है। ऐसे में, संस्कारविहीन लोग अक्सर हिंसक होकर अपनों की जान लेने तक उतर आते हैं तो आश्चर्य की क्या बात है?


यह भोगवाद की संस्कृति और भौतिक पदार्थों की मृग-मरीचिका का उप-उत्पाद है, जो केवल अपने सुख-सुविधाओं और अहम के आगे सोचती ही नहीं जबकि हमारे सद्ग्रंथ हमें त्यागपूर्वक भोग की शिक्षा देते हैं। पूरे वातावरण को कलुषित करने वाली ऐसी घटनाएं हमारी शिक्षा प्रणाली को भारतीय संस्कृति के नैतिक पक्ष से विमुख करने के प्रति सावधान करती है। समाज में एक दूसरे के प्रति संवेदना हो, आवश्यकता पड़ने पर एक हाथ दूसरे हाथ की मदद करने के लिए खुद-बखुद आगे आना चाहिए।

ऐसे श्रेष्ठ संस्कार राष्ट्र की नई पीढ़ी में कैसे रोपित किये जाएं, यह चिंता पूरे समाज की होनी चाहिए। यह सर्वविदित है कि आज परिवार टूट रहे हैं संयुक्त परिवार एकाकी हो रहे हैं। यह भी शर्मनाक परंतु सत्य है कि अब परिवार तो क्या, उसका हर सदस्य भी एकाकी हो चला है। कुछ लोग पैसे की चमक-दमक और आत्म-केंिद्रत सोच को पारिवारिक तनाव और कटुता का कारण मानते हैं। यदि सचमुच ऐसा है, तो यह कैसी उन्नति है, जिसमें मनुष्य में मनुष्यता का लगातार पतन हो रहा है?

क्या आपका मन आपसे यह प्रश्न नहीं करता कि आखिर कहां पहुंच गए हैं हम और हमारा समाज? आपसी संबंधों में तनाव की परिणति हिंसा में होना सचमुच सिहरन पैदा करता है। इसके अनेक कारण हो सकते हैं। आज, हम एक ऐसे समाज का अंग बनते जा रहे हैं, जहां हर आदमी आत्म-केंिद्रत है उसमें स्वार्थ कूट-कूटकर भरा है कोई किसी की बात ही नहीं सुनना चाहता। अब, हर समय तो कोई आपकी प्रशंसा, स्तुति, वंदना नहीं कर सकता, गलत को गलत भी कहना पड़ता है। यदि परिवार के किसी एक सदस्य को अधिक धन अथवा यश प्राप्त होता है तो बाकी सदस्य उसे ईष्र्या के रूप में क्यों लें?


नशे का बढ़ता चलन भी खतरनाक है। आज, हर शादी पार्टी में नशे का प्रचलन बढ़ता जा रहा है। कुछ लोग नशे में सुध-बुध खोकर संबंधों की मर्यादा को भी भूल जातेे हैं आज नशे के बदलते हुए रूप सामने आ रहे हैं। दौलत का नशा, रूप का नशा, सत्ता का नशा, योग्यता का नशा, ऊंचे संबंधों का नशा, जब और कोई नशा नहीं हो, तो अहम का नशा। क्या यह कटु सत्य नहीं कि आज हम बड़ी-बड़ी बातंे तो कर सकते हैं परंतु इस बुराई के विरूद्व एक भी कदम उठाते हुए हमारे पांव कांपने लगते हैं। यदि हम अब भी नहीं चेते, स्वयं को संस्कारित ढांचे में नहीं ढाला तो बहुत संभव है कि रिश्तों पर पानी फेरती घटनाओं का अगला शिकार हम ही 

आपके सवाल सद्गुरूनाथ जी महाराज के जवाब


 

पितृदोष से घबराएं नहीं करें सही उपाय


 

सुखी वैवाहिक जीवन और स्वास्थ्य जीवन के सूत्र


 

क्या होता है काल सर्प दोष


 

नवग्रह दोष को ऐसे करें दूर


 

शिविर से लाभ प्राप्त करने वाले भक्तों के अनुभव



 

भगवान शिव की पूजा ऐसे करें मिलेगा अपार लाभ


 

सद्गुरूनाथ संदेश, वाणी महादेव की


 

नर सेवा को नारायण सेवा समझते हैं गुरूवर


 

सद्गुरूनाथ संदेश, त्रैमासिक पत्रिका


 

Wednesday, October 4, 2023

रिश्ते हैं सुख का सार, इन्हें रखें संभाल कर: सद्गुरूनाथ जी महाराज

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने सत्संग के दौरान जिंदगी में बेहतर रिश्ता बनाने पर जोर दिया। उन्होंने कहा कि रिश्तेदारों से अच्छे संबंध अनमोल पूंजी है। समझदार लोग इस बात को अच्छी तरह समझते हैं, इसलिए वे छोटी-छोटी बातों को लेकर उनसे मनमुटाव नहीं करते। अच्छे रिश्तों के लिए कुछ मूल मंत्र हैं, जो संस्कारी लोग भली-भांति जानते हैं इसके लिए उन्हें न कॉलेज की डिग्रियों की जरूरत होती है, न कंप्यूटर के ज्ञान की बल्कि वे स्वतः ही उन्हें सहेजकर रखते हैं और आदतन उन्हें निभाते हुए मजबूत बनाते हैं यह उनके खून में शामिल होता है। 


आज के भौतिकतावादी युग में जबकि परंपरा से मानी जा रही नैतिकता, मानवीय मूल्यों पर सवाल उठाती नई पीढ़ी अपनी मनमानी पर तुली है, उनके लिए स्वार्थ से बढ़कर कुछ नहीं, जिसकी आग में रिश्ते-नाते सब जलकर खाक करने पर वे उतारू हैं, रिश्तों के महत्व को जान लेना और भी जरूरी हो गया है। उनका नकारात्मक रवैया पारिवारिक तथा सामाजिक व्यवस्था को मटियामेट कर देगा, अगर समय रहते उनकी चेतना को न जगाया जाए, उन्हें रिश्तों की अहमियत न बताई जाए।

रिश्ते आपको बेहतर बनाते हैं

आपकी मानवीय भावनाओं को पोसते हैं रिश्ते! संवेदनशील बनाते हैं, कर्त्तव्य निभाना सिखलाते हैं, आपको स्वकेिंद्रत होने से बचाते हैं इसीलिए यह आपकी बेहतरी के लिए आवश्यक बन जाते हैं।

सहारा होते हैं रिश्ते

वक्त-बेवक्त काम आते हैं रिश्ते। कितने ही घरों में बच्चे पढ़ाई के लिए या किसी और कारण से दादी, बुआ, मौसी, चाची, मामी के घर रहते हैं। रिश्ते इस तरह ‘ग्रेट सपोर्ट सिस्टम’ बन जाते हैं, जिससे आपको भावनात्मक सुरक्षा, नैतिक बल मिलता है।


रिश्ते हैं सदा के लिए

यह बंधन पल दो पल का साथ नहीं बल्कि जीवनभर का होता है। खून के रिश्ते कुदरत बनाती है, उसे सहेजकर रखते हैं आप। इन्हें तोड़ना बहुत आसान है अक्सर गलतफहमियों के चलते ही मनमुटाव होते हैं। संवाद बना रहे, मन साफ हो तो गलतफहमियां ज्यादा देर तक नहीं टिकती।

रिश्ते अनूठे होते हैं

हर रिश्ते की अपनी मिठास,अपनी गरिमा और अपना मजा है। एक से दूसरे की तुलना करने का कोई औचित्य नहीं है। हर व्यक्ति का अपना व्यक्तित्व अपनी अस्मिता होती है। उसका अपना स्लॉट है, जिसमें वह फिट है उसे उसी नजर से देखें। सबसे समान आशा न करें क्योंकि हर व्यक्ति अपने में एक द्वीप है। उसके अपने टारगेट्स अपनी महत्वाकांक्षाएं, जरूरतें होती हैं, जिनके अनुसार उसका बिहेवियर भी अलग होगा।


 रिचार्ज करते हैं रिश्ते

आज हर व्यक्ति चिंताओं में डूबा तनावों से घिरा नजर आता है जीने के लिए चारों ओर से उस पर दबाव है। ऐसे में मन की बोझिलता से मुक्त कराते हैं रिश्ते अगर आप अपने उन रिश्तेदारों से मिलते हैं, जिनके साथ बचपन की मधुर यादें जुड़ी हैं तो उन यादों को ताजा करते हुए आपका एड्रेनालिन कुलांचें भरने लगता है। कभी अवसादग्रस्त होने पर आप लो फील कर रहे होते हैं, तब मां का ममतामयी स्पर्श, पिता का सिर पर रखा हाथ आपको कितना सुकून देते हैं। हमारे भीतर जीने की जो ललक है, वह सदा एक सी नहीं रहती। बैटरी जब डिस्चार्ज होने लगती है, यह रिश्ते ही हैं, जो उन्हें रिचार्ज करते हैं। आपको भीतर से बाहर लाकर उत्साहवर्द्वन करते हैं, जीवंतता लाते हैं, एनर्जी देते हैं, नवजीवन का संचार करते हैं।


जबलपुर कथा का दूसरा दिन: गुरूदेव ने बताया जीवन में खुशहाली लाने के उपाय

जबलपुर: परम पूज्य सतीश सद्गुरूनाथ जी महाराज द्वारा पावन नवरात्रि पर शिवमहापुराण कथा के द्वारा भक्ति की अविरल जलधारा बहा रहे हैं। कथा के दूसर...