इस संसार में तीन प्रकार के लोग प्रायः पाए जाते हैं ! प्रथम वह जो इंजन की तरह होते हैं जो स्वयं तो चलते हैं साथ ही अन्य लोगों को जैसे डिब्बे , जो स्वयं तो नहीं चलते लेकिन अगर कोई उन्हें चलने में मदद करे तो चल पड़ते हैं ! तीसरे प्रकार के लोग वह होते हैं जो ना तो स्वयं चलते हैं और ना ही किसी और को चलने देते हैं ! वह सिग्नल की तरह होते हैं !
मैंने अपने जीवन में ऊंचाई पर बेठे लोगों को ज़मीन पर आते देखा है तथा विश्वासी , निरूस्वार्थी, निष्ठावान लोगों को ज़मीन से उठकर ऊंचाईयों को छूते देखा है! हमें आत्मविश्वासी के साथ गुरुविश्वासी भी होना चाहिए ! इस संसार में माता पिता और गुरुजन के अतिरिक्त आपका हित चाहने वाला कोई दूसरा नहीं है ! हमें गुरुजन के साथ माता पिता का भी सम्मान करना चाहिए !
गुरू हों या माता पिता वह पुत्र या शिष्य को सदैव सन्मार्ग की ओर प्रेरित करते हैं ! किसी शायर ने क्या खूब कहा है, आपके साथ चलेंगी आपकी परछाईयाँ ! आपके सतकर्म, पुण्य ,मन्त्र, सुमिरन सदैव आपके साथ रहेगा प्रायश्चित किये बिना इनसे मुक्ति सम्भव नहीं है !
मांस से बना शरीर गुरु नहीं है वरन उसके भीतर जो ज्ञान , अनुभव और तप का बल है वह गुरु है ! मेरे जीवन में गुरु कृपा और गुरु द्वारा दिए गए सकेतों के इतने उदाहरण हैं अगर मैं पुस्तक भी लिखूं तो कम है !
आप गुरु को व्यक्ति नहीं तत्व मानें ! मेरे से कई बार साधक प्रश्न करते हैं। यह सिद्धि क्या है ? इस विषय में मेरा छोटा सा उत्तर है। एक रंग में रंग जाना ही सिद्धि है और सिद्धि का मार्ग कठोर साधना की तंग गलियों से गुज़रता है ! मान लें आप किसी को अपने घर में बुलाते हैं तो क्या गंदे घर में बुलाएँगे ? साधना के लिए सिद्धि के अवतरण के लिए गुरु पहले आपको शुद्ध करता है ! आपका मन निर्मल करता है। आप देखें बेल भी किसी ना किसी के सहारे से ऊपर की ओर चढ़ती है। इसी प्रकार साधक भी गुरु के सहारे से जीवन में सफ़लता की सीढ़ियाँ चढ़ता है।
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