सत्संग के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराज अपने भक्तों को अपने प्रकार से कष्ट दूर करने के उपाय बताते हैं उनकी वाणी में ऐसा जादू हैं जो हर लोगों के सीधे दिल में उतर जाती है। बिल्कुल सीधे शब्दों में वे अपनी बात कहते हैं शिवमहापुराण, विष्णुपुराण, वैदिक शास्त्र की ऐसी गूढ़ बातें सिर्फ सद्गुरूनाथ जी ही बता सकते हैं।
गत दिनों सत्संग के दौरान उन्होंने बताया कि साधना और सिद्धि जब दोनों का मिलन होता है, तभी सिद्धि पूर्ण रूप से प्राप्त हो पाती है और स्थायी भाव से साधक के पास स्थित रहती है। सिद्धि को संकलित कर अपने कार्यों में उपयोग करने हेतु निरन्तर साधना अनिवार्य है।
साधना एक दिव्य भाव है। इस भाव में साधक स्वयं को समर्पित कर देता है । यह साधना किसके लिए हो ? यह प्रश्न भी महत्वपूर्ण है । साधना का सीधा और सरल अर्थ है, पूर्ण रूप से समर्पित कर उसी विचार में ‘ध्यान’ लगाना , साधना में साधक अपने गुरु का सिर्फ आदेश मानता है। सिर्फ सच्चे गुरू ही साधना के उच्चतम शिखर पर आपको पहुंचा सकते हैं। तब मन को शान्ति मिलती है, मन को एक आधार मिलता है , कष्टों में एक मार्ग दिखलाई देता है। यह एक कटु सत्य है, कि जीवन सीधा सरल नहीं है !
जीवन में तो अनेक परेशानियां हैं, कष्ट हैं, बाधाएं हैं , अड़चने हैं, पग पग पर शत्रु वार करने के लिए तैयार हैं ! वह तो हमारी पीठ पीछे सेकड़ों प्रकार के षडयंत्र तैयार कर लेते हैं और हमारा सारा जीवन तनाव , बाधाओं , अड़चनो, रोगी जीवन और परेशानियों से जूझते हुए व्यतीत होने लगता है ....और हम जीवन में जो कुछ करना चाहते हैं , वह चाहकर भी नहीं कर पाते हैं , फ़िर हम किस प्रकार इस जीवन में उत्साह , उमंग और जोश लायें ? वह कौन सा ऐसा माध्यम है जिसके द्वारा हम दिखा सकें कि एक सामान्य परिवार में उत्पन्न होकर भी हम बहुत कुछ कर सकते हैं ! यह ‘बहुत कुछ’ कर देने की क्षमता केवल निरंतर साधना द्वारा सम्भव है ।
नींद और ध्यान एक बार इसमें प्रवेश करने के बाद हम कहीं भी पंहुच सकते हैं।जीवन तो आपके हाथ में है ! सामान्य मनुष्य बस जीवन जी कर बिता लेता है ! आप जाकर देखलें सड़क पर सब सामान्य है। उनमे कुछ विशेषता है ही नहीं , उन्हें पता ही नहीं कि उनके आस पास कौन रहता है ? कौन चलता है ? साधक भी सामान्य जीवन जीता है।
गुरू से प्राप्त साधना को करने के लिए साधक को स्वयं को सिद्ध करना पड़ता है। उसके लिए एकनिष्ठ होना पड़ेगा ! किनारे पर खड़े होकर नदी को पार नहीं किया जा सकता है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र में हमारे वेद पुराण आदिकाल से ही कल्याणकारी जीवन व्यतीत करने का मार्ग निर्देशन करते रहे हैं ! वर्तमान युग में प्राचीन मान्यताओं के प्रति हमारी आस्थाहीनता अनेक प्रकार के कष्टों को जन्म दे रही है , परिणामस्वरुप धन धान्य सुख सुविधाओं के लिए हमारा मन इधर उधर भटकता है।

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