जब आप आज इंसानों पर नजर डालते है तो परमार्थ के मार्ग पर चलने के बावजूद लोग परेशान है,दुखी है,तकलीफ में हैं,आप अगर पूछेंगे तो कृपा है,आशीर्वाद है,आनंद है जैसे शब्द सुनने को मिलते हैं और बाद में किसी महात्मा,किसी भागवत स्थान पर आशीर्वाद मांगते हुए ,कोई मंत्र,कोई तावीज लेकर ,दान पुण्य कर अपने दुख दूर करने की कोशिश करते दिख जाते हैं।
कभी आपने सोचा है क्यों है जब ऐसा कहा जाता है की ईश्वर की शरण में सब दुख समाप्त हो जाते हैं फिर इंसानी जीवन में दुख क्यों ।
अपने आप से प्रश्न पूछिए ,सभी का जवाब आपके पास है, कभी अपने अंदर झांक कर तो देखिए।अगर प्राप्त हुई चीज पर मालिकाना हक रखेंगे तो भार तो चढ़ेगा ही ,उसका खर्चा ,उसका रखरखाव,उसकी टूटफूट सब आपने अपने जिम्मे डाल ली है जबकि यह आपको विशेष सुविधा दी गई थी इस जीवन भ्रमण के लिए ।जैसे कोई अधिकारी सरकारी काम से जाए तो उसके आवास ,उसकी गाड़ी सबकी सुविधा प्रदान की जाती है उस अधिकारी पर यात्रा का कोई भार नहीं होता वो उस समय का सदुपयोग करता है यात्रा का आनंद लेता है और लौट जाता है।अगर आप स्वयं को दी गई सुविधाओं और अधिकारों का दुरुपयोग करोगे तो सजा के हकदार हो जाओगे फिर वो यात्रा आनन्दायक न होकर दुखमय हो जायेगी।
अपने आसपास कुल प्रकृति पर नजर डालिए सब इस संसार में आपको कुछ न कुछ दे रहे है।सूर्य आपको रोशनी और ऊष्मा दे रहा है,वायु आपको गति और सांस प्रदान कर रहा है,जल आपको ठंडक के साथ कुल प्रकृति की प्यास बुझा रहा है,धरती आपको स्थायित्व के साथ अपनी ऊर्जा शक्ति से जीवन दे रही है वनस्पति प्रदान कर आपकी भूख शांत कर रही है और प्राणियों में श्रेष्ठ कहे जाने वाले मानव ने कैसे सोच लिया उसे सिर्फ ग्रहण करना है , संग्रह करना है जो दुख और तकलीफ का कारण है उसे भी देने का कार्य दिया गया था प्रेम बांटने का, मीठे बोल बांटने का,पर जब देने वाला अपने भाव के उलट काम करने लगे तो उससे गलत कर्म होंगे ही वो संग्रहण करने के लिए किसी का अधिकार छीनेगा उसे प्रकृति के नियम की अवहेलना होगी और संतुलन के लिए उसे वापस देना होगा कई गुना बढ़ाकर ,वापस देने में तकलीफ होगी इसी लिए महात्माओं ने इंसान को जगाया है।
हमेशा की दान दीजिए प्रेम का ,मीठे बोलो का ,किसी का दुख दूर कीजिए क्योंकि आपको भी प्रकृति प्रदान कर रही आपने भी इस संतुलन को बनाए रखना है आप भी ऐसा कर्म करेंगे तो कोई बंधन नहीं होगा जीवन में दुख उत्पन्न नहीं होगा ,जो हो रहा है उसे स्वीकार कीजिए क्योंकि जब आपकी गलती का संशोधन किया जाता है उसे आप जीवन में अनुभव करते है उसे आपबदुख का नाम दे दे देते हैं पर यह तो प्रकृति का संतुलन बनाने का विधान है।धन्यवाद कीजिए इस सर्वशक्तिमान ईश्वर का जिसकी कृपा से यह प्रकृति सब प्रदान कर रही है ,सहर्ष स्वीकार करें और सहर्ष बांट दीजिए ,अपना योगदान जारी रखिए आपके जीवन में सुख और आनंद कायम रहेगा ,अपने कर्म जागृत रह कर करिए आप देखेंगे आपका जीवन परिवर्तित हो जाएगा इसमें से दुख और तकलीफ गायब हो जाएगी और आपका आनंद में रहकर जीवन यात्रा का लाभ उठाएंगे ।
इस असीम कृपालु ईश्वर से प्रार्थना है हर मानव जागृत रहे ,प्रेम से भरपूर रहे ,सबका जीवन आनंददायक हो सब स्वस्थ रहे और जो जीवन में घटित हो रहा है उसे ईश्वर का प्रसाद मानकर स्वीकार करें ।जीवन में गलती संशोधन हो रहा हो तो उसे देख कर हर्षित रहे की कृपालु ईश्वर आपकी जीवन यात्रा को आनंदित बनाने का उपाय कर रहा है।

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