Friday, September 8, 2023

भगवान शिव से जुड़े अनेक रहस्यों से पर्दा हटाया गुरूवर ने

आध्यात्मिक गुरू एवं दिव्यदर्शी सद्गुरूनाथ जी महाराज भगवान भोलेनाथ के अनन्य भक्त माने जाते हैं। लोगों का मानना है कि महादेव पर इन पर विशेष कृपा है। तभी तो ये जिन पर भी अपना ममतामयी हाथ रख देते हैं उनके दुःख स्वतः दुर हो जाते है। शिवमहापुराण के दौरान जब वो बोलते हैं तो पूरा मंडल परिसर में भगवान भोलेनाथ के होने का आभास हजारों लोगों को हो चुका है। पिछले दिनों सद्गुरूनाथ जी महाराज ने  भगवान शिव से जुड़े हुए अनेक प्रश्नों का उत्तर अपने शिष्यों को दिया और कहा कि इस चराचर जगत में शिव से बड़ा कोई नहीं है। 

प्रश्नः गुरूवर ध्यान के देवता कौन है?

सद्गुरूनाथ जी: ध्यान के देवता भगवान शिव हैं।  वे आदियोगी के रूप में भी जाने जाते हैं और ध्यान, योग और कला के संरक्षक देवता के रूप में उन्हें मान्यता प्राप्त है। भगवान शिव के आदियोगी रूप में वे समस्त जगत की ध्यान-धारण की प्रेरणा और मार्गदर्शन करते हैं।


प्रश्न: भगवान शिव किसका ध्यान करते है?

सद्गुरूनाथ जी:  भगवान शिव किसी का ध्यान नहीं करते । वे सदैव समाधिग्रस्त रहते हैं। उनका ध्यान केवल और केवल अपने आप पर होता है, जहां वे निरंतर ध्यान और ध्येय  की एकता में रहते हें। उनका समाधान मानसिक और आध्यात्मिक स्थिति का प्रतीक है, जहां वे अविकारी, अनंत और पूर्णता के साथ स्थित होते हैं इसलिए शिव जी किसी व्यक्ति, देवता या अन्य किसी ध्येय पर ध्यान नहीं करते हैं उनका ध्यान केवल उनके स्वयं आत्मस्वरूप में होता है। 


प्रश्न: भगवान शिव के हाथ में त्रिशूल ही क्यों?

सद्गुरूनाथ जी: त्रिशूल भगवान शिव का प्रमुख अस्त्र है। यदि त्रिशूल का प्रतीक चित्र देखें तो उसमें तीन नुकीले सिरे दिखते हैं। यूं तो यह अस्त्र संहार का प्रतीक है पर वास्तव में यह बहुत ही गूढ़ बात बताता है। संसार में तीन तरह की प्रवृत्तियां होती हैं- सत, रज और तम। सत मतलब सात्विक, रज मतलब सांसारिक और तम मतलब तामसी अर्थात निशाचरी प्रवृति। हर मनुष्य में ये तीनों प्रवृत्तियां पाई जाती हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि इनकी मात्रा में अंतर होता है। त्रिशूल के तीन नुकीले सिरे इन तीनों प्रवृत्तियों का प्रतिनिधित्व करते हैं। त्रिशूल के माध्यम से भगवान शिव यह संदेश देते हैं कि इन गुणों पर हमारा पूर्ण नियंत्रण हो। यह त्रिशूल तभी उठाया जाए जब कोई मुश्किल आए। तभी इन तीन गुणों का आवश्यकतानुसार उपयोग हो।


प्रश्न - क्यों है भगवान शंकर का वाहन बैल?

सद्गुरूनाथ जी: भगवान शंकर का वाहन नंदी यानी बैल है। बैल बहुत ही मेहनती जीव होता है। वह शक्तिशाली होने के बावजूद शांत एवं भोला होता है। वैसे ही भगवान शिव भी परमयोगी एवं शक्तिशाली होते हुए भी परम शांत एवं इतने भोले हैं कि उनका एक नाम ही भोलेनाथ जगत में प्रसिद्ध है। भगवान शंकर ने जिस तरह काम को भस्म कर उस पर विजय प्राप्त की थी, उसी तरह उनका वाहन भी कामी नही होता। उसका काम पर पूरा नियंत्रण होता है।
साथ ही नंदी पुरुषार्थ का भी प्रतीक माना गया है। कड़ी मेहनत करने के बाद भी बैल कभी थकता नहीं है। वह लगातार अपने कर्म करते रहता है। इसका अर्थ है हमें भी सदैव अपना कर्म करते रहना चाहिए। कर्म करते रहने के कारण जिस तरह नंदी शिव को प्रिय है, उसी प्रकार हम भी भगवान शंकर की कृपा पा सकते हैं।


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