परम पूज्य सद्गुरूनाथ जी महाराज अपने प्रवचन में कहते है कि लोहा जब खान से निकलता है तो कोई अधिक महत्वपूर्ण नहीं होता है, लेकिन जब तपा कर ठोक पीटकर उससे कोई उपयोगी वस्तु बना दें तो उसका मूल्य कई गुणा बड़ जाता है। ठीक इसी प्रकार मनुष्य की स्थिति है । सब मनुष्य बराबर हैं लेकिन सदगुरु की द्रष्टि जिस पर पड़ती है उसके भीतर गुण ही गुण भर जाते हैं ! उसके भीतर ज्ञान की ज्योति जागृत हो जाती है ! गुरु एक प्रकाशमान दीपक होता है और शिष्य एक बुझा हुआ दीपक ! एक ऐसा दीपक जिसमे तेल बाती सब कुछ है ! प्रकाशित करने वाला कोई पूर्णगुरु नहीं मिला !
अष्टावक्र जब राजा जनक के दरबार में पंहुचे तो सब सभासद उन्हें देखकर हँसे थे क्योंकि उनका शरीर आठ जगह से टेड़ा मेडा था, लेकिन जब अष्टावक्र ने सभी के समक्ष ज्ञान की बातें की तो सभी आश्चर्य चकित हो गए। अष्टावक्र जी ने कहा मैंने तो सुना था कि राजा जनक के दरबार में सब गुणों के पारखी हैं। लेकिन मैं तो देख रहा हूँ कि यहाँ तो सब चमड़ी के पारखी हैं , वास्तविक विद्वान् कोई भी नहीं है।
सदगुरूनाथ जी महाराज समझाते हुए कहते कि नदी टेड़ी मेढ़ी हो सकती है पर उसका कलकल करके बहता शीतल जल टेड़ा मेढ़ा नहीं हो सकता है। शरीर के भीतर जो ज्ञान है वह टेड़ा मेढ़ा नहीं हो सकता है ! आज मैं देखता हूँ लोग गुरु तो मानते हैं लेकिन गुरु की बात नहीं मानते हैं ।
नश्वर संसार से मुक्ति के लिए दो ही मार्ग हैं ज्ञान मार्ग और कर्म मार्ग। ज्ञान मार्ग में आत्म-ज्ञान को उपलब्ध हुआ जाता है और कर्म मार्ग में कर्म करते हुए भी कर्म न करना होता है अर्थात कर्ताभाव समाप्त करना होता है। इस प्रकार कहा जा सकता है कि शरीर और कर्ताभाव से मुक्त होना ही मोक्ष को उपलब्ध होना है द्य इससे सिद्ध है कि मोक्ष जीवन की अंतिम परिणिति है। मनुष्य अपने जीवन काल में ही सुख-दुःख आदि द्वंद्वों से बाहर निकलकर इस संसार से मुक्त हो जाता है। इसमें व्यक्ति ‘तत्वमसि’ से ‘अहं ब्रह्मास्मि’ की स्थिति की और बढ़ता है।
वेदांत में आत्म-साक्षात्कार को ही मोक्ष माना गया हैं। शरीर की मृत्यु के पश्चात् वह ब्रहम में ही विलीन हो जाता है। निर्वाण’ शब्द का अर्थ है, बुझ जाना निर्वाण का अर्थ है अपनी भावनाओं पर संयम रखना, जिससे व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चल सके।
सदाचार जीवन का ही दूसरा नाम निर्वाण है द्य निर्वाण का अर्थ है, वासनाओं से मुक्ति मन में जितनी भी कामनाएं उठी हैं, उन सभी कामनाओं को शांत कर लेना, उन कामनाओं का बुझ जाना।तभी तो मैं बार बार कहता हूँ दृ गुरु कृपा हि केवलं शिष्स्य परं मंगलम !
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