Wednesday, September 6, 2023

गुरूनिष्ठा और भक्तिभाव से ही मानव श्रेष्ठ बनता है: सद्गुरूनाथ जी महाराज

सद्गुरूनाथ जी महाराज सत्संग के दौरान कहते है कि मनुष्य के अंतःकरण में अनेक प्रकार के मनोविकार होते हैं, जिनके वशीभूत होने के कारण उसे वास्तविकता के दर्शन नहीं होते। वह अहंकार में रहता है उसमें गलत सही का विवेक नहीं रहता। ये मनोविकार दूर होता है गुरू से ज्ञान प्राप्त होने पर। 


मन से प्रेम और भक्ति उड़ गई ईर्ष्या विरोध आ गया तो समझ लेना चाहिए कि माया ने अपना जाल बिछा दिया है, मन मलिन हो गया है और पाप कर्म बनते जा रहे हैं। यदि शिष्य कोई खोट, कर्म करता है तो सतगुरु उसे बुराई करने से रोकते हैं। सत्संग में सब बातें कही जाती हैं जिससे शिष्य अपने आप को सुधार ले और माफी मांग ले कि आइन्दा ऐसी गल्ती नहीं करेगा। यदि बार-बार समझाने पर भी वो नहीं मानता है तो ऐसे व्यक्ति से भगवान भी मुंह मोड़ लेते हैं। 


जो गुरु का आदेश हो उसका पालन करना गुरु की सेवा है इसी को गुरु भक्ति कहते हैं धन  की सेवा करो और समझो कि गुरु प्रसन्न हो गए तो ऐसी बात नहीं है । नाशवान वस्तुओं को देकर गुरु की प्रसन्नता नहीं हासिल की जा सकती । वचन का पालन करो और भजन करो तो ये आत्मिक सेवा है और उत्तम सेवा है।

ऐसा करने से गुरु की दया तुम पर बरसेगी और जीवात्मा अन्धेरे से निकलकर प्रकाश में खड़ी हो जाएगी, उसकी आंख खुल जाएगी और गुरु का दिव्य स्वरूप अन्तर में प्रकट हो जाएगा। इसलिए सबसे पहले तुम यही सेवाकरो कि गुरु के आदेश का पालन करो । जो भी हुक्म हो उसे सिर माथे रखकर अपना कर्तव्य निभाओ। 

अगर तुम गुरु से प्यार करते हो, अगर तुम्हारा प्रेम गुरु से है तो तुम्हें वही करना चाहिए जो उसका हुकम हो या जो जो उसे अच्छा लगे। दूसरों के पीछे पडना परमार्थी का काम नहीं, ऐसा करने से वक्त बर्बाद होता है । ऐसी हालत तो दुनियांदारों की होती है । परमार्थी को तो अपने पीछे पड़ना चाहिए जिससे अपना सुधार हो ।

दुनियाँ के कामों के लिए जितना जरुरी हो उतना समय दो बाकी समय अधिक से अधिक परमार्थ के चिन्तन में और भजन में लगाओ ।

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