नवरात्रि जिसमें नव दुर्गा की आराधना की जाती है। नवरात्रि पर्व की नौ रात्रियाँ प्रकृति के द्वारा मनुष्य को दिया गया वह भेंट हैं। जब मनुष्य अपने भीतर मलिनता को हटाकर आध्यात्म की ओर अग्रसर होता है। परिणाम स्वरूप मनुष्य के भतर इन नव-रात्रियों में नव-निर्माण का आध्यात्मिक कार्य गतिशील होता है।
यह सृष्टि चक्रीय-धारा में चल रही है। किसी सीधी रेखा में नहीं। प्रकृति के द्वारा हर वस्तु का नवीनीकरण हो रहा है। हर रात्रि के बाद दिवस है तो दिवस के बाद रात्रि। हर पतझड़ के बाद बसंत आती है तो बसंत के बाद पतझर निश्चित है। यहाँ जन्म और मृत्यु भी चक्राकार है। सुख के बाद दुःख तो दुःख के पश्चात सुख भी निश्चित चल रहा हे। प्रकृति की स्थूल से सूक्ष्म तक की सभी रचनाएं पुरातन से नीवन से पुरातन के चक्रीय मार्ग का ही अनुसरण कर रही है। नवरात्रि का त्यौहार भी मनुष्य के मन व बुद्धि को संसार की दौड़ में से लौट कर स्वयं में खोने का निश्चित सुअवसर है।
नवरात्रि उत्सव के चार मूलभूत साधन
संसार में भटकते चित्त को स्वयं के स्तोत्र तक वापिस लौटने के लिए मौन, प्रार्थना, सत्संग और ध्यान के मूलभूत आधार चाहिए। मौन हमारे मन की भटकन को दूर करता है तो प्रार्थना से यही मन ईश्वर में एकाग्र होने की चेष्टा करता है। सत्संग में ईश्वर के स्वरुप का सही निर्णय होता है और साधना का संपूर्ण मार्ग श्री गुरु सत्संग के माध्यम से ही उजागर करते हैं। ततपश्चात् ध्यान की सम्यक् विधियों के द्वारा मनुष्य अपने मूल स्तोत्र (सत-चित्त-आनंद) की ओर गमन करते हुए परम-रहस्य का साक्षात्कार करता है।
नवरात्रि नवीनीकरण का उत्सव
नवरात्रि का यह उत्सव मनुष्य के भीतर आंतरिक यात्रा कर के, नवीनीकरण को प्रकट करने का उत्सव है। यह समस्त ब्रह्माण्ड एक ही शक्ति से उत्पन्न हुआ है, संचालित हो रहा है और उस एक ही शक्ति में विलय को प्राप्त होगा। इसी शक्ति को हम ‘आद्य शक्ति’ कहते हैं। इस शक्ति को असंख्य नाम-रूपों से पूजा गया है। कोई इसे मात्र ‘देवी’ कहता है तो कोई ‘शक्ति’। कोई देवी और शक्ति को दुर्गा, काली, सरस्वती, लक्ष्मी, गौरी आदि के नाम और विविध रूप से पूजता है। परंतु हर मान्यता देवी को ‘माँ’ मानती है क्योंकि समस्त जड़ व चेतन पदार्थों की उत्पत्ति इस एक ही शक्ति में से हुई है और महा-विलय के पश्चात् सब कुछ इस एक शक्ति में ही खो जाता है।
नवरात्रि का उत्सव इस एक शक्ति, आद्य शक्ति को उजागर करने का सुअवसर है। वैसे तो यह शक्ति इस ब्रह्माण्ड के कण-कण में सक्रिय है परंतु मनुष्य इस महा-रहस्य से अपरिचित है क्योंकि तमस-रजस-सत्त्व गुणों की त्रिगुणात्मकता में ही मनुष्य का मन उलझा हुआ है।
तमस-रजस-सत्त्व का शुद्धिकरण
नवरात्रि के यह नौ दिन हमारे मन में रहे इन तीन गुणों का शुद्धिकरण करने के दिन हैं। तमस-रजस-सत्त्व से गुंथी हुई मनुष्य की प्रकृति अज्ञानता और मोह के कारण परिभ्रमण में उलझी हुई है। इन नौ- दिनों में क्रमशः इन तीन प्रकृतियों में शुद्धिकरण कर के मनुष्य के भीतर नव-निर्माण की संभावना को दृढ़ करना है।
प्रथम तीन दिवस: तमस का विसर्जन
धर्म संस्कृति में नवरात्रि उत्सव के प्रथम तीन दिवस ‘देवी दुर्गा माँ’ की पूजा होती है। अध्यात्म संस्कृति में इन प्रतीकों का महत्व होने से ‘देवी दुर्गा माँ’ के रहस्य को समझ कर अपने भीतर शुद्धि करने के यह तीन दिवस हैं। ‘दुर्ग’ का अर्थ होता है पहाड़, पर्वत, शैल। मनुष्य के भीतर पहाड़ जैसा ही अहंकार, अज्ञान और आसक्ति का भण्डार पड़ा है। प्रथम तीन दिवस में मौन-प्रार्थना-सत्संग व ध्यान के चतुर्विध आयाम से मन के भीतर पड़े इस ‘तमस’ को जान कर इससे मुक्त होने की ‘आद्य-शक्ति’ को प्रार्थना करनी है। साथ ही साथ अध्यात्म पथ पर हम सद्गुरू व उनके बताए मार्ग के प्रति पर्वत की तरह अकंप श्रद्धा व निष्ठा से भरे रहे कृ ऐसी भाव-समृद्ध याचना करनी है।



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