ऊँ नमः शिवाय। ‘सत्यम शिवम सुंदरम’जो सत्य है वह ब्रह्म है-ब्रह्म अर्थात परमात्म। जो शिव है वह परम शुभ और पवित्र आत्म तत्व है जो सुंदरम है वही परम प्रकृति है। अर्थात परमात्मक शिव और पार्वती के अलावा कुछ भी जानने योग्य नहीं है। इन्हें जानना और इन्हीं में लीन हो जाने का मार्ग है-हिंदुत्व।
लंबी-लंबी खूबसूरत जिनकी जटाएं है, जिनके हाथ में पिनाक धनुष है, जो सत स्वरूप है अर्थात सनातन हैं, दिव्य गुणसम्पन्न, उज्जवल स्वरूप होते हुए भी जो दिगम्बर है। जो शिव नागराज वासुकी का हार पहने हुए हैं, वेद जिनकी बारह रूद्रों में गणना करते हैं, पुराण उन्हें शंकर और महेश कहते हैं उन शिव का रूप विचित्र है। अर्धनग्न शरीर पर भभूत मले जटाधारी, गले में रूद्राक्ष और सर्प लपेटे, तांडव नृत्य हैं तथा नंदी जिनके साथ रहता है। इनके जन्म के बारे में कोई नहीं बता सकता वे स्वयंभू माने गए हैं।
वायु पुराण के अनुसार प्रलयकाल में समस्त सृष्टि जिसमें लीन हो जाती है और पुन- सृष्टिकाल में जिससे प्रकट होती है, उसे लिंग कहते हैं। इस प्रकार विश्व की संपूर्ण ऊर्जा ही लिंग की प्रतीक है। वस्तुत- यह संपूर्ण सृष्टि बिंदु-नाद स्वरूप है। बिंदु शक्ति है और नाद शिव। बिंदु अर्थात ऊर्जा और नाद अर्थात ध्वनि। यही दो संपूर्ण ब्रह्मांड का आधार है। इसी कारण प्रतीक स्वरूप शिवलिंग की पूजा-अर्चना है।
वेदों , स्मृतियों , पुरणों में शिव पुराण में भगवान शिव सृष्टि और प्रलय का रूप है । शिव पुराण और लिंग पुराण में शिव अजन्मा और जीवों , वनस्पतियों , जंतुओं देवों की उत्पत्ति एवं सृष्टि कारक है । शिव के अट्ठाईस अवतारों के संबंध में शिव पुराण के " वायवीय संहिता " और लिंगपुराण में वर्णित है। ब्रह्मा, विष्णु और रुद्र कारणात्मा और चराचर जगत् की सृष्टि, पालन और संहार और साक्षात् महेश्वर से प्रकट हुए हैं ।



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