Wednesday, September 13, 2023

सद्गुरूनाथ जी महाराज ने बताया मूलाधार चक्र की विशेषताएं

 एक नया दिन आता है तो साथ में नया उल्लास और नईं आश लेकर भी आता है ताकि हम अपने जीवन को नयें विचारों से सुवासित एवं उल्लासित कर सकें। मानव मन को भी प्रतिदिन सद्विचार और सत्संग रूपी साबुन से स्वच्छ करने की जरूरत होती है ताकि विचारों की कलुषिता का मार्जन हो सके।

सद्गुरूनाथ जी महाराज अक्सर सत्संग के दौरान कहते हैं कि यदि बुद्धि को परिमार्जित करते हुए उसमें प्रतिदिन साफ करके कुछ श्रेष्ठ विचार, कुछ सद्विचार न भरे जाएं तो हमारे वही कलुषित विचार जीवन के लिए जहर बनकर उसकी आत्मिक उन्नति में बाधक बन जाते हैं। सदा सत्संग के आश्रय में रहो ताकि हृदय की निर्मलता और विचारों की पवित्रता बनी रहे।

आज सद्गुरूनाथ जी महाराज मूलाधार चक्र के बारे में बता रहे है जिसको सक्रिय करने के बाद आप जीवन में श्रेष्ठ मुकाम हासिल कर सकते हैं। दुःख आपको छू भी नहीं पाएगी।

मूलाधार का मतलब है मूल आधार यानी यह हमारे भौतिक ढांचे का आधार है। अगर यह आधार स्थिर नहीं हुआ तो इंसान न तो अपना स्वास्थ्य ठीक रख पाएगा, न ही अपनी कुशलता और संतुलन ठीक रख पाएगा। इंसान के विकास के लिए ये खूबियां बेहद ही आवश्यक हैं। ऐसा माना जाता है कि पिछले जीवन की यादें तथा कार्यों को इस क्षेत्र में संग्रहित किया जाता है। इस चक्र की वजह से मनुष्य को चेतना, जीवन शक्ति और संवृध्दि जैसी विशेषताएं प्राप्त होती हैं। हालांकि, इसके अनुचित कार्य की वजह से परिणामतः आलस्य तथा आत्म केंद्रित प्रवृत्ति आ सकती है।


मूलाधार चक्र की सकारात्मक उपलब्धियां स्फूर्ति, उत्साह और विकास हैं। नकारात्मक गुण हैं सुस्ती, निष्क्रियता, स्वार्थी और अपनी शारीरिक इच्छाओं द्वारा प्रभावित होना। मूलाधार-चक्र अग्नि वर्ण का त्रिभुजाकार एक आकृति होती है, जिसके मध्य कुण्डलिनी सहित मूल स्थित रहता है। इस त्रिभुज के तीनों उत्तंग कोनों पर इंगला, पिंगला और सुषुम्ना आकर मिलती है। इसके अंदर चार अक्षरों से युक्त अग्नि वर्ण की चार पंखुड़ियां नियत हैं। ये पंखुड़ियां अक्षरों से युक्त हैं- स, ष, श, व। यहां के अभीष्ट देवता के रूप में गणेश जी नियत किए गए हैं। जो साधक साधना के माध्यम से कुण्डलिनी जागृत कर लेता है अथवा जिस साधक की स्वास-प्रस्वास रूप साधना से जागृत हो जाती है और जागृत अवस्था में उर्ध्वगति में जब तक मूलाधार में रहती है, तब तक वह साधक गणेश जी की शक्ति से युक्त व्यक्ति हो जाता है।

मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। पृथ्वी तत्व का अर्थ गंध है। इस चक्र मे ध्यान साधक को इच्छा शक्ति की प्राप्ति कराता है। इसी कारण ‘’ध्यानफल श्री विघ्नेश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये। मूलाधार चक्र को जागृत करने के लिए आपको कुछ नियमों का पालन करना होता है तभी आप इस चक्र को जागृत करने में सक्षम बन सकते हैं।

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