एक नया दिन आता है तो साथ में नया उल्लास और नईं आश लेकर भी आता है ताकि हम अपने जीवन को नयें विचारों से सुवासित एवं उल्लासित कर सकें। मानव मन को भी प्रतिदिन सद्विचार और सत्संग रूपी साबुन से स्वच्छ करने की जरूरत होती है ताकि विचारों की कलुषिता का मार्जन हो सके।
सद्गुरूनाथ जी महाराज अक्सर सत्संग के दौरान कहते हैं कि यदि बुद्धि को परिमार्जित करते हुए उसमें प्रतिदिन साफ करके कुछ श्रेष्ठ विचार, कुछ सद्विचार न भरे जाएं तो हमारे वही कलुषित विचार जीवन के लिए जहर बनकर उसकी आत्मिक उन्नति में बाधक बन जाते हैं। सदा सत्संग के आश्रय में रहो ताकि हृदय की निर्मलता और विचारों की पवित्रता बनी रहे।
आज सद्गुरूनाथ जी महाराज मूलाधार चक्र के बारे में बता रहे है जिसको सक्रिय करने के बाद आप जीवन में श्रेष्ठ मुकाम हासिल कर सकते हैं। दुःख आपको छू भी नहीं पाएगी।
मूलाधार का मतलब है मूल आधार यानी यह हमारे भौतिक ढांचे का आधार है। अगर यह आधार स्थिर नहीं हुआ तो इंसान न तो अपना स्वास्थ्य ठीक रख पाएगा, न ही अपनी कुशलता और संतुलन ठीक रख पाएगा। इंसान के विकास के लिए ये खूबियां बेहद ही आवश्यक हैं। ऐसा माना जाता है कि पिछले जीवन की यादें तथा कार्यों को इस क्षेत्र में संग्रहित किया जाता है। इस चक्र की वजह से मनुष्य को चेतना, जीवन शक्ति और संवृध्दि जैसी विशेषताएं प्राप्त होती हैं। हालांकि, इसके अनुचित कार्य की वजह से परिणामतः आलस्य तथा आत्म केंद्रित प्रवृत्ति आ सकती है।
मूलाधार चक्र पृथ्वी तत्व का प्रतीक है। पृथ्वी तत्व का अर्थ गंध है। इस चक्र मे ध्यान साधक को इच्छा शक्ति की प्राप्ति कराता है। इसी कारण ‘’ध्यानफल श्री विघ्नेश्वरार्पणमस्तु’’ कहके उस चक्र के अधिदेवता को अर्पित करना चाहिये। मूलाधार चक्र को जागृत करने के लिए आपको कुछ नियमों का पालन करना होता है तभी आप इस चक्र को जागृत करने में सक्षम बन सकते हैं।

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