Thursday, September 14, 2023

ईश्वर को पाने के लिए प्रेम मार्ग से गुजरना होगा: सद्गुरूनाथ जी महाराज

जब व्यक्ति का प्रेम कामना रहित होता है तो यह शक्ति होती है और जब प्रेम में किसी चीज को पाने का लोभ रहता है तो यह आसक्ति बन जाती है। सच्चा प्रेम वह होता है जो प्रेम में किसी प्रकार का लोभ और किसी चीज को पाने की कामना नहीं रखता है। ऐसा व्यक्ति प्रेम में ऐसा कमाल कर जाता है कि, बड़े से बड़े बलवान और धनवान उसके आगे घुटने टेक देते हैं।

मीराबाई को दिया गया जहर असरहीन होना। धु्रव को पहाड़ की चोटी से गिराने पर भी बच जाना, प्रह्लाह का आग के शोलों में भी मुस्कुराते हुए रहना और तुलसीदास का उफनती नदी को पार कर जाना यह प्रेम की शक्ति का उदाहरण है। सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि जिसके हृदय में सच्चा प्रेम होता है वही व्यक्ति ईश्वर का भक्त हो सकता है। जरूरत है बस प्रेम की चाहे वह पैसे से हो, किसी स्त्री से, बच्चे से या अन्य सांसारिक वस्तुओं से।

अगर हृदय में प्रेम होगा ही नहीं तो ईश्वर क्या संसार में किसी चीज से लगाव हो ही नहीं सकता। भगवान से प्रेम करना वास्तव में उसी प्रकार है जैसा एक दिशाहीन गाड़ी को सही दिशा देना। गुरूदेव ने कहा है कि जिसके हृदय में प्रेम का अंकुर होता है उस व्यक्ति को भक्ति की ओर प्रेरित किया जा सकता है, क्योंकि प्रेम का वृक्ष तभी उग सकता है जब प्रेम का बीज, प्रेम का अंकुर हृदय में मौजूद हो। बिना बीज के खेती भला कैसे हो सकती है।

आज के समय में ईश्वर प्रेमियों की सबसे बड़ी मुश्किल यही है कि इतने संसारी संसाधनों और आकर्षणों के बीच, असत्य भरे माहौल में रहकर भक्ति कैसे की जाए? यह कला अगर सीखनी है तो शबरी से बेहतर उदाहरण और कौन होगा, जिसने तामसिक और असत्य से भरे मायावी वातावरण के बीच रहते हुए भी भक्ति की शीतल अग्नि का चुनाव किया, श्रीराम का चुनाव किया।

इंसान के कर्म उसके विचारों से उत्पन्न होते हैं। शुभ विचारों में बहुत शक्ति होती है। ये शब्द बहुत ही उपयुक्त हैं। आज कई समस्याएँ सिर्फ इसलिए मौजूद हैं क्योंकि हमने आंतरिक शांति की उपेक्षा कर दी है। इसलिए पहले हैपी थॉट्स द्वारा आंतरिक शांति उत्पन्न करें।’ मन का बुद्ध बनना अर्थात मन को ऐसा प्रशिक्षण देना, जिससे मन हर ऽ परिस्थिति में शांत अथवा आनंदित रह पाए। समस्याएँ, बीमारियाँ या कोई भी घटना होने के बावजूद जब मन अकंप, आनंदित और सकारात्मक रह पाता है तब होती है मन के बुद्ध बनने की यात्रा। यह यात्रा किसी तीर्थयात्रा से कम नहीं है, 

 जब लहर स्वअनुभव से अपने मूल स्वरूप को जानकर, विशाल समुंदर के साथ एक हो जाएगी तो उसके सभी तनाव, दुःख, समस्याएँ सब एक साथ विलीन हो जाएँगे।

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