क्या आपके साथ कभी कोई ऐसा वाकया हुआ है, जब आपको लगा हो स्वयं सद्गुरूनाथ जी महाराज ने आपकी सहायता की?
संध्या पटना से सद्गुरूनाथ जी महाराज की शिष्या ने सद्गुरूनाथ जी महाराज से दीक्षा ली थी। कुछ दिन पहले उन्होंने ईमेल द्वारा अपनी अनुभूति बताई है। जो इस प्रकार है।
मेरे साथ एक बार नहीं, कई बार ऐसा हुआ है ज़ब जीवन में लगा कि सद्गुरूनाथ जी महाराज ने मेरी किसी ना किसी रूप में मदद की हो..... !
ये उस समय की घटना ज़ब मेरी शादी को केवल 15 दिन ही हुए थेै मेरे भाई बहन सब मुझसे छोटे हैं, मैं घर में सबसे बड़ी हूँ इसलिए मुझमें समझदारी भी काफ़ी है।मेरी शादी के बाद मेरे मायके से मेरे छोटे भाई बहन मुझे लेने आये थे। चूँकि भाई मुझसे 8 साल छोटा है, वो 9 में पढ़ता है। जिस दिन मेरा भाई मेरे चचेरे भाई बहनों के साथ आया था उस दिन नवरात्रि चल रही थी। उस दिन आने जाने में काफ़ी भीड़ रहती थी।
ये लोग शाम को 5 बजे तक आ पाए थे, उसके बाद हम लोग घर के लिये निकले मेरा मायका मेरे ससुराल से 40 कि. मी. है तो किसी बड़े ने साथ में आने की बात भी नहीं सोची।
जैसे तैसे 8 बजे रात के निकलना हुआ, मैं क्यूँकि पहली बार ससुराल से मायके जा रही थी तो पूरे ज़ेवर भी पहने थी। हम लोग खूब खुश होकर जा रहे थे तभी रास्ते में करीब 25 कि. मी. आगे आकर गाडी खराब हो गई, ड्राइवर किराये का था, उसने जंगल में गाडी रोक दी। अब सब बच्चे परेशान होने लगे। केवल लड़कियाँ और छोटे लड़के, मेरी छोटी बहिन जो मुझसे केवल 2 साल छोटी है उसने घर पर फ़ोन किया।
घर वाले सब परेशान हो गए क्यूँकि रात ज्यादा होती जा रही थी और किसी के पास घर पर बाइक के अलावा कोई गाडी भी नहीं थी। जो ड्राइवर था वो भी इधर उधर फोन करने लगा। मैं उसके इरादे समझ गई थी, लेकिन मैंने अपने भाई बहनों को कुछ भी परेशानी जाहिर नहीं की।
बल्कि मैं यही कहती रही कुछ नहीं होगा अभी कोई ना कोई मदद आ जाएगी, लेकिन मन ही मन बहुत ज्यादा डर लग रहा था मेरे घरवालों ने ससुराल वालों को फ़ोन किया उन्होंने उल्टा मेरे पापा को खरी खोटी सुना दी।
मैंने फिर अपने गुरूवर सद्गुरूनाथ जी महाराज को याद किया, क्यूँकि कभी भी कोई परेशानी होती है, मेरे गुरूवर मदद जरूर करते हैं। मेरे मायके में गुरूजी जी को बहुत माना जाता है, तो मुझे कुछ नहीं सूझा तो मैंने गुरूजी का जी का भजन मोबाइल में हल्की आवाज़ में चला लिया, मैं गाडी के अंदर बैठी थी और जेवर उतार कर बैग में रख लिये केवल नथ मुझसे नहीं उतर पा रही थी तो मैंने शाल से मुँह ढक लिया।
अब मुझे रोना आ रहा था लेकिन रो भी नहीं पा रही थी केवल मन ही मन बोल रही थी गुरूजी जी मदद, गुरूजी जी मदद........ !!
उधर मेरे घर वाले गाड़ी का बंदोबस्त करने में लगे थे लेकिन कोई भी आने को तैयार नहीं था।
इधर मैं गुरू जी को याद कर रही थी (यहाँ तक कि अभी मैं जब ये घटना लिख रही हूँ तो आँखों में आँसू आ रहे हैं) उधर बिहारी जी ने मदद भेज दी लगभग 15 मिनट मैंने बिहारी जी को याद किया तभी हमारे खानदान के एक परिचित अपनी इंनोवा गाड़ी लेकर आये और जहाँ हमारी गाड़ी ख़डी थी वहीं उन्होंने गाड़ी रोक दी। हालांकि उन्हें हमारे बारे में वहाँ होने की कोई जानकारी नहीं थी, उन्होंने पूछा तुम लोग यहाँ कैसे फिर मेरी बहिन ने सब बताया, उन अंकल ने पापा को फोन किया और कहा आप परेशान मत होना मैं बच्चों को ला रहा हूँ।
इसे कहते हैं गुरू कृपा... !
अब जो ड्राइवर था उसका मुँह देखने लायक था, अंकल ने सबको गाडी में बिठाया और केवल आधे घंटे में घर पहुंचा दिया। मैं रास्ते भर आँसू रोकने की कोशिश करती रही लेकिन आंसू रुक नहीं पा रहे थे। गुरूजी को याद किया और उन्होंने मदद के लिये किसी को भेज दिया।
अब सोचती हूँ अपने तर्क भी लगाती हूँ कि ये एक इक्तेफाक भी हो सकता है, लेकिन इक्तेफाक इतना नहीं हो सकता कि उसी समय किसी का इंनोवा लेकर आना।
क्या आपके साथ कभी ऐसा हुआ है कि आपको लगाहो कि स्वयं सद्गुरूनाथ जी ने आपकी मदद की है



No comments:
Post a Comment