Monday, August 28, 2023

जो यज्ञ को त्यागता है उसे स्वयं परमात्मा त्याग देते है

 मनोबुद्ध्यहङ्कारचित्तानि नाहं न च श्रोत्रजिह्वे न च घ्रणनेत्रे।
न च व्योम भूमिर्न तेजो न वायुश्चिदानन्दरूपः शिवोऽहं शिवोऽहम्॥ 

भगवान शिव ज्ञान विवेक विचार और समाधि अर्थात् समाधान के देवता हैं। वस्तुतः अज्ञान ही जीवन की सबसे बड़ी बाधा है। शिव-तत्व अत्यंत प्रखर मुखर और चैतन्य रहता है। आओ अपने अंतःकरण को शुभ संकल्पों से भावित कर शुभता, सकारात्मकता, और स्वयं में अंतर्निहित अनंतता का जागरण करें !

सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि मन का एक जगह न ठहरना ये आज सबसे बड़ी समस्या है। लोग कहते हैं कि हम क्या करें? हमारा तो मन ही शिव भक्ति में एक जगह नहीं ठहरता है। आखिर कैसे स्थिर करें चंचल मन को। आप सभी इस बात को ऐसे समझें हमारे अंतर:करण के चार अंग हैं मन, बुद्धि, चित्त और अहंकार ! हम अंतःकरण को जो भी उद्देश्य देंगे, हमारा अंतरूकरण उसी उद्देश्य को पूरा करने में जुट जायेगा।  मन उसी पर मनन करेगा, चित्त में उसी का चिन्तन चलेगा, बुद्धि उसी का निश्चय करेगी अहंकार उसी में स्वयं को स्थापित कर लेगा।  अगर हमारा अंतःकरण किसी उद्देश्य की प्राप्ति में संलग्न न हो तो वह उद्देश्य कभी पूरा हो ही न पायेगा ! अंतःकरण ही वह उपकरण वह यंत्र है , जो हमें अस्तित्व ने हमारी सिद्धियों को प्राप्त करने के लिए दिया है। हमारा मन यह भी जानता है कि अगर उसे ‘मोक्ष का उद्देश्य दिया जाए , तो वह उसका विषय उसका कार्य नहीं है।  स्वयं को  सत्य जानने के लिए न तो मन की आवश्यकता है , ना चिन्तन की , ना यह बुद्धि का विषय है ना अहं का।

मन को हमेशा शिवभक्ति में लगाए रखो, मन को व्यर्थ कार्य करने ही मन दो। आपको लगेगा कि मन धीरे-धीरे एकाग्रचित हो रहा है। जो भी जीवन की खुशियां हो उसे ढुढो और उसमें मन को आनंदित करो। 

शिवमहापुराण कथा के दौरान सद्गुरूनाथ जी महाराजे ने यज्ञ के महत्व पर प्रकाश डाला और कहा कि हमारी प्राचीन संस्कृति को अगर एक ही शब्द में समेटना हो तो वह शब्द है यज्ञ ! यज्ञ शब्द संस्कृत की यज धातु से बना हुआ है जिसका शाब्दिक अर्थ होता है दान, देवपूजन एवं संगतीकरण। परमार्थ परायण कार्य को भी ‘यज्ञ’ कहते है।


यज्ञ कभी भी ‘स्वयं’ के लिए नहीं किया जाता है , बल्कि विश्व कल्याण के लिए किया जाता है।  सोचें , वेदों के बिना यज्ञ कहाँ होगा और वेदों के बिना यज्ञ कार्य भी कैसे पूर्ण हो सकता है ? जिस प्रकार मिटटी में मिला अन्न कण सौ गुणा हो जाता है, उसी प्रकार मन्त्र उचारण के साथ अग्नि में मिला पदार्थ लाख गुणा हो जाता है ! यज्ञ की महिमा अनन्त है। 

यज्ञ से आयु , आरोग्यता, तेजस्विता, विद्या, यश, पराक्रम , वंशवृद्धि, धन, धान्यादि सभी प्रकार के राज भोग, ऐश्वर्य , लोकिक एवं पारलोकिक वस्तुओं की प्राप्ति होती है।  यज्ञ अनेक प्रकार के होते हैं।  रूद्र यज्ञ , सूर्य यज्ञ , विघ्न विनायक गणेश यज्ञ , लक्ष्मी यज्ञ  श्री यज्ञ, लक्ष चंडी यज्ञ, भागवत यज्ञ, श्री लक्ष्मी यज्ञ , विष्णु यज्ञ , नवग्रह शान्ति यज्ञ आदि इस प्रकार अनेक प्रकार के यज्ञ होते आ रहे रहे हैं।

यज्ञों को वेदों में कामधेनु कहा गया है ! ‘यजुर्वेद’ में कहा गया है कि जो यज्ञ को त्यागता है उसे स्वयं परमात्मा त्याग देता है। यज्ञ के द्वारा ही साधारण मनुष्य देव योनी को प्राप्त करते हैं ! शास्त्रों में गायत्री को माता और यज्ञ को पिता माना गया है !


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