Wednesday, August 30, 2023

सत्संग, सुमिरन और श्रेष्ठ गुरू की शरणागति ही इन समस्याओं का पूर्ण समाधान है: सद्गुरूनाथ जी महाराज

प्रचार-प्रसार से दूर रहकर एक निष्काम कर्मयोगी की तरह सद्गुरूनाथ जी महाराज जिस तरह से हिंदू संस्कृति एवं शिव महापुराण कथा को घर-घर तक पहुंचाने का भगीरथ प्रयास कर रहे हैं। ऐसी मिसाल कम ही देखने को मिलती है। सद्गुरूनाथ जी महाराज जनमानस के लिए एक आदर्श हैं मार्गदर्शक हैं। विलक्षण प्रतिभा के धनी है गुरूदेव।

सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते हैं कि जीव की चेतना पूर्ण परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखे बिना पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकती।  ईश्वर की यही विशेषता है कि वह मार्ग भी बताता है, मार्ग का निर्वाह भी करता है और उसका फल भी देता है। जब मार्ग बताता है तब ईश्वर होता है ज्ञान स्वरूप। जब निर्वाह करता है तब ईश्वर होता है सत-स्वरूप और जब फल देता है तब ईश्वर होता है आनन्द-स्वरूप। इस प्रकार सच्चिदानन्द स्वरूप है और प्रेरक, फलदाता तथा निर्वाह के समय स्थित-स्थापक आत्म-धारणानुकूल व्यापार उत्पन्न करने वाला प्रभु है। 

   अच्छा देखो, साँस लेते हैं तो वही हृदय को स्पन्दन देता है, जिससे हम साँस को खींच सकें या ले सकें, और वही श्वास के रूप में आता-जाता है। वहीं हमें जीवन देता है। जिस प्रकार साँस-के लिए-जो एक शरीर की वस्तु है- पूर्ण वायु की आवश्यकता हो रही है, उसी प्रकार हमारे शरीर में जो चेतना है, वह व्यक्तिगत होते हुए भी उसे सच्चिदानन्द-स्वरूप पूर्ण चेतना से भी सत्ता मिलती है, ज्ञान मिलता है और आनन्द मिलता है। 

इसका अर्थ यह हुआ कि जैसे हम बाहर की वायु के बिना, समष्टि वायु के बिना, जीवित नहीं रह सकते; साँस नहीं ले सकते वैसे ही हमारी अथवा किसी भी जीव की चेतना पूर्ण परमेश्वर के साथ सम्बन्ध रखे बिना पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सकती। इसलिए आप अपने जीवन-कर्म के प्रेरक रूप में, निर्वाह रूप में और फलदाता-रूप में परमेश्वर को पहचान लीजिये। न अपने आप बुद्धि भगवान में लगती है औन न किसी के द्वारा प्रेरित किए जाने पर लगती है। तब तक भक्ति जागृत नहीं होती जब तक किसी महान संत या गुरू की कृपा उस भक्त पर न हो। 


तन का रोग मिटाना कदाचित संभव भी है पर मन का रोग मिटाना असम्भव तो नहीं कठिन जरूर है। तन का रोगी रोग को स्वीकार कर लेता है लेकिन मन का रोगी कभी भी रोग को स्वीकार नहीं कर पाता।

दूसरों की उन्नति से जलन, दूसरों की खुशियों से कष्ट, दूसरों के प्रयासों से चिन्ता एवं अपनी उपलब्धियों का अहंकार यह सब मानसिक अस्वस्थता के लक्षण ही तो हैं। सत्संग, सुमिरन और भगवद शरणागति ही इस बीमारी का पूर्ण समाधान है।

 

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