सावन के शुक्लपक्ष की पंचमी तिथि यानी 21 अगस्त को नाग पंचमी मनाई जाएगी। कुछ राज्यों में ये पर्व कृष्ण पक्ष को मनाया जाता है। यह पर्व चतुर्मास में मनाया जाता है, जिसके दौरान नकारात्मक ऊर्जाओं को नियंत्रित करने के लिए संयम, व्रत, उपवास और दान-पुण्य जैसे सकारात्मक साधनों को अपनाया जाता है। भगवत पुराण के अनुसार नाग के 12 रूप हैं जो सूर्य के रथ को खीचते हैं। इन 12 नागों अनंत, वासुकी, शेष, पदम, कम्बल, ककोंटक, अश्वतर, धृतराष्ट, शंखपाल, कालिया, तक्षक और पिंगल नाग की पूजा का विधान है।
सद्गुरूनाथ जी महाराज ऐसे धार्मिक गुरु हैं, जिनके मधुर भजन और प्रवचन सुन आत्मा भीतर से आनंदित होती है। सद्गुरूनाथ जी महाराज भगवान शिव के अनन्य भक्त हैं और शिवमहापुराण के महान कथावाचक हैं. इन्होंने देश-दुनिया में लोगों को आध्यात्मिकता का अनुभव कराया. ये शिव महापुराण कथा के दौरान दुःख निवारण शिविर का आयोजन भी करते हैं जिसमें आने वाले लोगों के जीवनम में आ रही समस्याओं का ये चुटकी में हल बता देते हैं।
Sunday, August 20, 2023
नाग पंचमी: नागदेवता की पूजा का है आध्यात्मिक महत्व : सद्गुरूनाथ जी महाराज
अग्निपुराण में 80 प्रकार के नाग कुलों के बारे में बताया गया है। भगवान शिव के साथ वासुकी जुड़ा है तो भगवान विष्णु के साथ शेषनाग। ऋग्वेद में पृथ्वी को सर्प रजनी माना गया है। सर्प मानसिक और आध्यात्मिक पटल पर कुंडलिनी शक्ति का प्रतीक है। आध्यात्मिक स्तर पर नाग हमारे अहंकार या ईगो का प्रतिबिंब भी है। नाग पंचमी का पर्व दरअसल अहंकार का त्याग करना और विनम्र बनाना सिखाता है।
वैज्ञानिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो यह हमारे भीतर कुंडली के रूप् में बैठी एनर्जी का भी प्रतीक है जिसे जाग्रत कर कायनेटिक एनर्जी में परिवर्तित किया करना पड़ता है। स्थिर ऊर्जा से पूर्ण ऊर्जा तक पहुंचने का यह रास्ता सर्पिलाकार है। इस प्रक्रिया को कुंडलिनी जागरण कहते हैं। शेषनाग पर योग निद्रा में लीन भगवान विष्णु स्थिर उर्जा के प्रतीक हैं तो योगी स्वरूप शिव पूर्ण ऊर्जा के प्रतीक हैं। नागलोक सृष्टि व चेतना के निम्नतम स्तर या समकर्षण है। वहीं सूर्य मंडल की आभा से पूर्ण आदित्य उच्चतम लोक है। इन दोनों लोकों की श्याम और श्वेत उर्जाओं के बीच संतुलन बैठाने की एक प्रक्रिया है नागदेवता की पूजा।
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