Saturday, August 19, 2023

उपासना, साधना, विद्या अध्ययन, श्रेष्ठ साधनों का प्रयोग करना ही ‘धर्म’ है

 ‘’गरीब होना कोई गुनाह तो नहीं ? तेरे गुरु के सिवा तेरा दर्द किसी ने सुना भी नहीं ? जो ज़िद पर आ जाएँ रुख मोड़ दें तूफानों के ! तुमने अभी ताकत कहाँ देखे हैं शिव भगवान के। 

मेरा एकमात्र उद्देश्य है शिवत्व से दुनिया को जोड़ना! मैं ऐसे लोगों को देखना चाहता हूँ जब चुभन तो किसी और को हो, पर पीड़ा उनको हो, रोये तो कोई और, लेकिन आंसू उनके निकल आयें! मैं ऐसे शिष्य को देखना चाहता हूं, जो अपने कार्यालय में बेठे हों , वहां कार्य भी कर रहे हों, खेत में परिश्रम कर रहे हों।  जो जीवन में पूरी सघनता के साथ खड़े हों,  तनिक सोचो तुम साधक हो गुरू भक्ति करते हो, अनुभव भी होते हैं ,   चमत्कार भी होते हैं। पर स्वयं को पहचानते नहीं हो, जो मैं तुममे देखता हूँ वह तुम्हे स्वयं में नहीं दिखता ! 


 साधक हैं जिनका सीधा सम्बन्ध भगवान से है, ब्रह्माण्ड से है, अन्तरिक्ष से है ! भगवान की उनपर अति कृपा है ! भगवान उनसे ‘ध्यान’ में भेंट करते हैं और पूरे ब्रह्माण्ड का मायाचक्र उन्हें समझा देते हैं।  धन्य हैं ऐसे गुणी शिष्य जिनकी श्रेणी सर्वोत्तम है। कुछ शिष्य ऐसे हैं ऐसे भी हैं जिनकी गति वायुयान से भी कहीं तेज़ है।  वह जितनी तीव्र गति से प्रकट होते हैं , उससे भी अधिक तीव्र गति से अद्रश्य हो जाते हैं ! इसीलिए तो कहता हूँ ‘शिवत्व एक रंग बिरंगे फूलों का गुलदस्ता है ! इसमें भाँती भाँती के फूल हैं !

आज वर्तमान में मानव के समक्ष प्रश्न यह है कि वह संसार में कहाँ से आता  है ? और बाद में मृत्यु होने पर कहाँ चला जाता है ? उसका जन्म लेने का कारण क्या है ? मनुष्य जीवन के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए उसके पास क्या क्या साधन हैं ? जिसका उपयोग करके वह निज उद्देश्य की प्राप्ति कर सकता है।

 वैदिक शास्त्रों ने मानव जीवन का प्रथम उद्देश्य एवं लक्ष्य, धर्म , अर्थ , काम और मोक्ष की प्राप्ति को बतलाया है ! कहा गया है कि सिद्धि से साक्षात्कार ही साधक के जीवन का उद्देश्य है जिसे प्राप्त कर लेने पर ‘संतुष्टि’ की प्राप्ति होती है। सिद्धि के लिए साधक को स्वयं का आचरण कैसा बनाना होता है। 

शिव महापुराण मेें कहा गया है कि अधर्म, अविद्या, कुसंग, कुसंस्कार, बुरे व्यसन से अलग रहना और सदैव सत्य बोलना, विद्या, पक्षपात रहित न्याय, धर्म की वृद्धि करना, गुरु की आज्ञा का पालन करना है।  उपासना , साधना , विद्या अध्ययन , श्रेष्ठ साधनों का प्रयोग करना ही ‘धर्म’ है ! जो कुछ भी करें सदैव पक्षपात रहित  न्याय और धर्म के अनुसार ही करें ! इन सब साधनों से ‘मुक्ति’ होती है ! इसके विपरीत कार्यों से जन्म और मरण का चक्र शुरू होता है 

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