भगवान औघड़ नाथ सदैव तपस्या में गहन ध्यान में और चिन्तन के मार्ग पर अग्रसर रहते हैं। उनकी अधमूंदे नेत्र ध्यान और गहन चिन्तन के प्रतीक हैं। उर्जा का विस्तार भगवान शिव को असीम और अनन्त बनाता है ! अपने भीतर असीमित उर्जा होने के कारण भोले नाथ ‘नृत्य’ करते हैं। धधकते शमशान में वास करते हैं ! शिव को सावन माह बहुत प्रिय है ! शिव कभी निद्रामग्न नहीं होते हैंए सदैव जाग्रत अवस्था में ही रहते हैं !
यूँ तो हम प्रतिदिन जागते हैं, सोते हैं , लेकिन जब हम आध्यत्मिक रूप से जाग जाते हैं तब शिव से भेंट होती है ! गुरुवर कहते हैं श्रावण माह में ही समुन्द्र मंथन से 14 रत्नों की प्राप्ति हुई थी ! जिसमे से एक हलाहल ( विष ) भी था ! जिसे भोले नाथ ने अपने कंठ में स्थापित कर लिया था ! विष की जलन रोकने के लिए सभी देवताओं ने उनपर गंगा जल डाला ! संभवतः तभी से जलाभिषेेक की परम्परा प्रारम्भ हुई ! शिव को अगर पाना है तो अपने भीतर से स्वार्थ, इर्ष्या , द्वेष , अहंकार , क्रोध को दूर करना होगा। ह्रदय को निर्मल , विरक्त और पवित्र करना होगा ! श्रावण रस का माह भी है ! श्रावण सृजन का भी माह है ! श्रावण माह का हर दिन , हर माह, हर पल उपवास , शिव का स्मरण करने का और स्वयं में परिवर्तन लाने का माह है, क्योंकि परिवर्तन ही शिव हैं।
सद्गुरूनाथ जी महाराज कहते है कि शिव को देखो, उनकी कृपा को अनुभव करो ,श्रावण की बौछार में भीगो , क्यों ? क्योंकि हमें शिव की कृपा प्राप्त करनी है ! हमें श्रावण के रस का आनन्द लेना है ! शिव हमें वो नहीं देते जो हमें चाहिए। शिव हमें वह देते हैं , जिसके हम योग्य होते हैं ! हमारी योग्यता ही कुछ प्राप्त करने का सबसे बड़ा पैमाना है ! सावन शिव के साथ सृजन का भी माह है। सृजन के लिए निर्मल प्रेम , समर्पण और पवित्रता अनिवार्य है।
शक्ति के साथ शिव कल्याणकारी हों इसलिए श्रावण माह पूरी तरह शिव और शक्ति को समर्पित है ! आप देखें शक्ति पहाड़ों पर वास करती है और शिव शमशानवासी हैं। क्या आपने कभी कोई ऐसा शमशान देखा है जहाँ शिव नहीं हैं ? आप देखें तीर्थ में जो शमशान हैं उन्हें महाशमशान और नगरों , महानगरों के शमशान को केवल शमशान कहते हैं ! आप वाराणसी को ही ले लें वहां दो शमशान हैं ! इनमे से एक को शमशान और दूसरे को महाशमशान कहते हैं ! यह भगवान शिव की लीला स्थली है।
मृत्यु क्या है ? यह एक बहुत बड़ी घटना है ! यह केवल मूर्छित अवस्था में ही घटती है । श्री महाकाली शिव की ही एक शक्ति हैं ! जब यह शमशान में लीला करती हैं तब शमशान काली होती हैं ! कितनी मिथ्या धारणा है ? कुछ साधक शमशान में साधना करते हैं ! किसकी ? श्री महाकाली की ! जहाँ उनकी सत्ता ही नहीं है वहां उनकी साधना करना अर्थात असफ़लता को निमंत्रण देना ! ‘
काली’ शब्द का अर्थ है काल की पत्नी ! काल भगवान शिव का एक नाम है ! अतः शिव पत्नी को ही काली नाम दिया गया है ! इन्हें ‘’आद्या काली’ भी कहते हैं ! मार्कंडेय पुराण के ‘दुर्गा सप्तशती खण्ड’ में भगवती अम्बिका के ललाट से जिन ‘काली’ की उत्पत्ति का वर्णन किया गया है , भगवती ‘आद्याकाली’ उनसे भिन्न हैं ! भगवती ‘श्री महाकाली’ के रूप भेद कारोड़ों हैं ! वास्तव में सभी देवी देवियाँ , योगनियाँ आदि भगवती की ही प्रतिरूपा हैं !
भगवती काली के स्वरूपों में ‘दक्षिण काली’ प्रमुख हैं ! शास्त्रों के अनुसार पञ्चशून्ये स्थिता तारा सर्वान्ते कालिकास्थिता अर्थात पाँचों तत्वों तक सत्वगुणात्मिका भगवती तारा की स्थिति है तथा सबके अंत में श्री महाकाली स्थित हैं ! श्री महाकाली दिगंबरा हैं इसका आशय यह है कि वह मायारूपी आवरण से आच्छादित नहीं हैं अर्थात माया उन्हें अपनी लपेट में नहीं ले सकती हैं ! श्री महाकाली नित्य यौवनवती हैं अर्थात श्री महाकाली की अवस्था में कोई परिवर्तन नहीं होता ! वह नित्य चित्त स्वरूपा युवती जैसी बनी रहती हैं ! गुरु स्मरण !!

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